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कच्चे तेल की क़ीमत में गिरावट- कारण और प्रभाव/ Crude oil price drop – Causes and Effects-

कच्चे तेल का अमेरिकी सूचकांक वेस्ट टैक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) के सोमवार को शून्य से नीचे 37 डॉलर प्रति बैरल तक फिसलने के बाद दुनिया के तेल एवं वित्तीय बाजारों में गिरावट देखने को मिल रही है।

कीमतों में गिरावट के मुख्य कारण:-

  • कच्चे तेल के वायदा कारोबार में कीमतों में गिरावट आई है। वायदा कारोबार में खरीदार एक खास समय में निर्धारित कीमत पर कच्चा तेल वायदा खरीदने के लिए सौदा करता है। गिरावट की मुख्य वजह ताजा डिलिवरी लेने और भंडारण लागत से बचने के लिए कारोबारियों द्वारा अपना माल घटाए जाने की कोशिश करना था। डब्ल्यूटीआई कीमतें 0.10 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई थीं, जो गिरावट से मामूली सुधार था।
  • अमेरिकी तेल के लिए बेंचमार्क कीमत कोविड-19 महामारी के प्रसार से पहले 50 डॉलर प्रति बैरल थी और मौजूदा कमजोरी वैश्विक मांग में एक-तिहाई की गिरावट की वजह से आई है। अमेरिका में लॉकडाउन के बाद लोगों द्वारा ईंधन का कम इस्तेमाल किए जाने से मांग में कमजोरी को बढ़ावा मिला है।
  • ओपेक, रूस, अमेरिका और जी-20 देशों समेत तेल उत्पादकों द्वारा वैश्विक उत्पादन प्रति दिन 1 करोड़ बैरल तक घटाने को लेकर सहमति जताई गई है। हालांकि मौजूदा कमजोर कीमतों से संकेत मिलता है कि यह प्रयास मौजूदा चिंताओं को दूर करने के उपायों के अंतर्गत कम प्रभावी है क्योंकि मांग में हर दिन 3 करोड़ बैरल तक की कमी आई है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि दुनिया में जरूरत की तुलना में ज्यादा तेल उपलब्ध है, अथवा लोग लॉक डाउन इत्यादि कारणों से तेल का कम प्रयोग कर रहे हैं।

कीमतों में उतार-चढ़ाव के सामान्य कारण-

  • तेल की कीमतें विभिन्न कारकों से प्रभावित होती हैं, लेकिन विशेष रूप से पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा किए गए उत्पादन के बारे में निर्णयों के प्रति उत्तरदायी हैं।
  • किसी भी उत्पाद की तरह, आपूर्ति और मांग के कानून कीमतों को प्रभावित करते हैं; स्थिर मांग और ओवर सप्लाई के संयोजन ने पिछले पांच वर्षों में तेल की कीमतों पर दबाव डाला है।
  • प्राकृतिक आपदाएं जो संभावित रूप से उत्पादन को बाधित कर सकती हैं, और मध्य पूर्व जैसे तेल-उत्पादक क्षेत्रों में राजनीतिक अशांति भी मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती हैं।
  • उत्पादन लागत भंडारण की क्षमता के साथ-साथ कीमतों को प्रभावित करती है; हालांकि कम प्रभावशाली, ब्याज दरों की दिशा वस्तुओं की कीमत को भी प्रभावित कर सकती है।

कोरोनोवायरस का प्रभाव :-

  • कोरोनावायरस ने दुनिया भर में ऊर्जा की मांग को कम कर दिया है, लेकिन विशेष रूप से चीन में, जो सबसे बड़ा आयातक है।
  • विश्व के सभी देशो में कारखानों को निष्क्रिय कर दिया गया है और चीन के वुहान में शुरू होने वाले कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण दुनिया भर में हजारों उड़ानें रद्द हो गई हैं, ।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने सोमवार को कहा कि उसे उम्मीद है कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद 2009 में मंदी के बाद पहली बार इस साल संकट प्रभावी होगा

किन देशों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा?

  • रूस कम कीमतों के लिए सबसे अधिक अछूता होने का दावा करता है क्योंकि इसका वार्षिक बजट लगभग $ 40 प्रति बैरल की औसत कीमत पर आधारित है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने इसे और अधिक कुशल बनने के लिए मजबूर कर दिया है।
  • खाड़ी देशों ने सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में $ 2- $ 6 प्रति बैरल की अनुमानित लागत पर तेल का उत्पादन किया, लेकिन उच्च सरकारी खर्च और नागरिकों के लिए उदार सब्सिडी के कारण,अपने बजट को संतुलित करने के लिए उन्हें 70 डॉलर प्रति बैरल या अधिक की कीमत में विक्री की आवश्यकता है
  • तेल पर निर्भर वे राज्य जो संघर्ष, या प्रतिबंधों के वर्षों से पीड़ित हैं, वे सबसे भारी कीमत का भुगतान करेंगे। इराक, ईरान, लीबिया और वेनेजुएला सभी उस श्रेणी में हैं। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका भी इससे प्रभावित होगा । कुछ राज्यों के लिए शेल ऑयल का उछाल आर्थिक मंदी लेकर आया है और कम कीमतों से तेल कंपनियों को नुकसान होगा।

भारत पर इसका प्रभाव :-

  • जहां तक भारतीय बाजार की बात है तो यह कच्चे तेल को 25 प्रतिशत भारांश देते हुए अपने आयात मानकों का निर्धारण करता है। इसका कच्चा तेल बास्केट इस समय वर्ष 2019-20 के औसत 60.6 डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी 20 डॉलर प्रति बैरल रह गया है।
  • भारतीय कच्चा तेल बास्केट बेंचामार्क 75 प्रतिशत भारांश दुबई-ओमान को देता है। दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती से कच्चे तेल की मांग पहले ही कम हो गई थी, लेकिन कोविड-19 महामारी से हालात और बिगड़ते चले गए।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार वर्ष 2020 में तेल की वैश्विक मांग कम होकर 90 लाख बैरल प्रति दिन रह जाएगी।
  • आईईए के अनुसार इससे एक दशक की वृद्धि दर के बराबर नुकसान होगा। आईईए ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘तेल उद्योग के लिए अप्रैल सबसे खराब महीना साबित हो सकता है। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले तेल की मांग 2.9 करोड़ बैरल तक कम हो सकती है।’
  • भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है और तेल कीमतों में कमी से इसे लाभ भी मिल सकता है, लेकिन भारत में उत्पादों की कीमतों उनके अपने मानक सूचकांकों से जुड़ी होती है।
  • इसके अतिरिक्त डॉलर के मुकाबले रुपये के 76.63 तक फिसलने से तेल कीमतों में कमी से होने वाला लाभ सीमित रह सकता है। इस बीच, भारत विशाखापत्तनम, मंगलूर और पाडुर में 53.3 लाख टन तेल का रणनीतिक भंडार जमा करना चाहता है।
  • कच्चा तेल (ब्रेंट) शेष दुनिया या दुनिया की करीब दो-तिहाई मांग के लिए बेंचमार्क है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार कच्चे तेल में भारतीय भागीदारी देसी रिफाइनरियों में प्रसंस्कृत कच्चे तेल के सोर ग्रेड (ओमान और दुबई एवरेज) और स्वीट ग्रेड (ब्रेंट) के 75.50 : 24.50 अनुपात का प्रतिनिधित्व करती है। डब्ल्यूटीआई कीमतों का लंबी अवधि में ब्रेंट कीमतों पर कुछ असर दिख सकता है।
  • तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए बेहतर होगा क्योंकि भारत की ट्विन डेफिसिट में एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतें हैं।

इसका उपभोक्ताओं पर प्रभाव-

  • चीन, भारत और जर्मनी जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा बिल गिरने से कुछ आवश्यक राहत मिल सकती है।
  • उपभोक्ताओं को कम तेल की कीमतों और पंप पर गैस की कीमतों में गिरावट से सामान्य रूप से लाभ होता है, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में जहां खुदरा बाजार सीधे आपूर्ति और मांग के लिए अधिक प्रतिक्रिया करते हैं। कर और अधिभार यूरोप में पंप की कीमतों का एक उच्च हिस्सा बनाते हैं, इसलिए वहां प्रभाव कम चिह्नित है।
  • लेकिन गैस की कीमतों में किसी भी कमी की संभावना वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण कोरोनोवायरस की वजह से अर्थव्यवस्था को अव्यवस्थित होने से होगी।
  • फिर इस मूल्य युद्ध का प्रभाव टेक्सास, लुइसियाना, ओक्लाहोमा, न्यू मैक्सिको और नॉर्थ डकोटा जैसे राज्यों में अमेरिकी तेल उत्पादकों और ऊर्जा क्षेत्र के रोजगार पर पड़ेगा, जिन्होंने पिछले एक दशक में उछाल का आनंद लिया है।

कीमतों को रोकने के उपाय-

  • तेल की कीमतें थामने के लिए तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और रूस ने मई और जून में उत्पादन में 97 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती करने की घोषणा की थी।
  • कीमतों में गिरावट रोकने के लिए जुलाई और दिसंबर में इसे कम कर 77 लाख बैरल प्रति दिन और अप्रैल 2022 तक 58 लाख बैरल प्रति दिन तक करने की योजना तैयार की गई थी। माना जा रहा है कि 2020 के अंत तक इससे बाजार में कुछ हद तक तेल का भंडार कम हो सकता है।