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Telemedicine: A New Horizon in Public Health / टेलीमेडिसिन: सार्वजनिक स्वास्थ्य में एक नया क्षितिज-

वर्तमान में ‘टेलीमेडिसिन’ जिसे ई-स्वास्थ्य सुविधा का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है, कि आवश्यकता को महसूस किया जा रहा है। इस समय संपूर्ण देश की स्वास्थ्य अवसंरचना COVID-19 महामारी के प्रसार को रोकने में लगी हैं। ऐसे में अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों के समक्ष चिकित्सीय सुविधाओं को प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। भारत में टेलीमेडिसिन और टेलीहेल्थ के वर्तमान परिदृश्य का मूल्यांकन करने का यह सही समय है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अध्ययन में यह पाया गया कि टेलीमेडिसिन भारत की संपूर्ण जनसंख्या के लिये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि कर सकता है, इससे मुख्यतः ग्रामीण आबादी अत्यधिक लाभान्वित होगी।

टाइम पत्रिका ने टेलीमेडिसिन को ‘हीलिंग बाई वायर’ (healing by wire) के नाम से संबोधित किया है। हालाँकि प्रारंभ में इसे ‘भविष्यवादी’ और ‘प्रायोगिक’ माना जाता था, लेकिन टेलीमेडिसिन आज एक वास्तविकता है। निश्चित ही भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के कार्मिक कंप्यूटर के कुशल जानकार नहीं हैं, वस्तुतः चिकित्सा में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के संबंध में जागरूकता और जोखिम की कमी है। ये भारत में टेलीमेडिसिन के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। निस्संदेह, हमें तकनीकी जागरूकता की कमी को रुकावट नहीं बनने देना चाहिये और नवाचारों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये।

क्या है टेलीमेडिसिन?-

  • टेलीमेडिसिन स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की एक उभरती हुई विधा है जहाँ सूचना प्रौद्योगिकी के साथ चिकित्‍सा विज्ञान के सहक्रियात्‍मक संकेन्‍द्रण से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्‍वास्‍थ्‍य के विभिन्न क्षेत्र जैसे- शिक्षा, प्रशिक्षण और प्रबंधन के अनेक अनुप्रयोगों के अलावा स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल प्रदायगी की चुनौतियों को पूरा करने की अपार संभाव्‍यता निहित है।
  • यह उतना ही प्रभावी है जितना एक टेलीफोन के ज़रिये चिकित्‍सा संबंधी किसी समस्‍या पर रोगी और स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ आपस में बात करते हैं।
  • ईसीजी, रेडियोलॉजिकल इमेज आदि जैसे नैदानिक परीक्षणों, चिकित्सीय जानकारी के लिये  इलेक्‍ट्रॉनिक चिकित्‍सा रिकॉर्ड भेजने और आईटी आधारित हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की सहायता से रियल टाइम आधार पर अंत:क्रियात्‍मक चिकित्‍सा वीडियो कॉन्‍फ्रेंस करना, उपग्रह और स्‍थलीय नेटवर्क द्वारा ब्रॉडबैंड के उपयोग से वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग जैसे जटिल कार्य करना भी इसका भाग है। 

टेलीमेडिसिन का इतिहास-

  • पिछले कुछ  वर्षों में टेलीमेडिसिन के द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में दी गई सेवाएँ दूरसंचार प्रौद्योगिकी के अपेक्षाकृत नए उपयोग के रूप में दिखाई देती हैं, सच्चाई यह है कि टेलीमेडिसिन विगत 30  वर्षों से किसी न किसी रूप में उपयोग में है। नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration-NASA) ने टेलीमेडिसिन के शुरुआती विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • टेलीमेडिसिन में NASA के प्रयास 1960 के दशक की शुरुआत में प्रारंभ हुए जब मानव ने अंतरिक्ष में उड़ान भरना शुरू किया। मिशन के दौरान फिजियोलॉजिकल पैरामीटर को अंतरिक्ष यान से प्रेषित किया गया था।  
  • टेलीमेडिसिन का सबसे शुरुआती प्रयोग एरिज़ोना प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रदान करने के लिये किया गया।
  • वर्ष 1971 में नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के द्वारा अलास्का के 26 स्थलों को चुना गया ताकि यह देखा जा सके ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने की दिशा में तकनीकी द्वारा टेलीमेडिसिन का प्रयोग कितना कारगर है।  
  • वर्ष 1989 में नासा ने पहला अंतर्राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन कार्यक्रम प्रारंभ किया जिसके तत्त्वावधान में आर्मेनिया के येरेवन शहर में एक टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किया गया। इसके बाद अमेरिका में चार स्थलों पर टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किये गए, जो कंप्यूटर, इंटरनेट इत्यादि तकनीकी सुविधाओं से लैस थे।

भारत में टेलीमेडिसिन का विकास –

  • भारत में इसरो ने वर्ष 2001 में टेलीमेडिसिन सुविधा पायलट प्रोजेक्ट के साथ प्रारंभ की, जिसने चेन्नई के अपोलो अस्पताल को चित्तूर जिले के अरगोंडा गाँव के अपोलो ग्रामीण अस्पताल से जोड़ा था।
  • इसरो द्वारा की गई पहल में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, विदेश मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ राज्य सरकारों ने भी भारत में टेलीमेडिसिन सेवाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मानकीकृत टेलीमेडिसिन चिकित्सा दिशानिर्देश जारी किये गए और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2005 में एक राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन टास्क फोर्स की स्थापना जैसे सकारात्मक कार्य किये गए।
  • इसरो का टेलीमेडिसिन नेटवर्क एक लंबा सफर तय कर चुका है। इस नेटवर्क में 45 दूरस्थ ग्रामीण अस्पतालों और 15 सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों को जोड़ने का कार्य किया का चुका है। दूरस्थ क्षेत्रों में अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप के विभिन्न द्वीप, जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र, उड़ीसा के मेडिकल कॉलेज और अन्य राज्यों के कुछ ग्रामीण / जिला अस्पताल इस नेटवर्क में शामिल हैं।

टेलीमेडिसिन के क्षेत्र –

  • टेलीहेल्थ- टेलीहेल्थ लंबी दूरी की क्लिनिकल हेल्थकेयर, रोगी और पेशेवर स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षा और प्रशिक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रशासन का समर्थन करने के लिये इलेक्ट्रॉनिक सूचना और दूरसंचार प्रौद्योगिकियों का एक समूह है।
  • टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र– टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र वह स्थल है जहाँ रोगी उपस्थित होता है। एक टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र में, रोगी की चिकित्सा जानकारी को स्कैन / परिवर्तित करने, बदलने और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के साथ साझा करने के लिये उपकरण उपलब्ध होते हैं।
  • टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर- टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर एक स्थल है, जहाँ स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद रहते हैं। वह दूरस्थ स्थल में मौजूद रोगी के साथ बातचीत कर सकता है और उसकी रिपोर्ट देख सकता है तथा उसकी प्रगति की निगरानी कर सकता है।
  • टेलीमेडिसिन प्रणाली- टेलीमेडिसिन प्रणाली हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और संचार चैनल के बीच एक इंटरफेस है जो अंततः सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और दो स्थानों के बीच टेलीकाउंसलिंग को सफल बनाने के लिये दो भौगोलिक स्थानों को जोड़ने का कार्य करता है। हार्डवेयर में एक कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, वीडियो-कांफ्रेंसिंग उपकरण आदि होते हैं। वहीँ सॉफ्टवेयर रोगी की जानकारी (चित्र, रिपोर्ट, फिल्म) आदि को सक्षम बनाता है। संचार चैनल कनेक्टिविटी को सक्षम करता है जिससे दो स्थान एक दूसरे से जुड़ सकते हैं।

टेलीमेडिसिन की उपयोगिता-

  • सुदूर क्षेत्रों तक आसान पहुँच। 
  • परिधीय स्वास्थ्य सेट-अप में टेलीमेडिसिन का उपयोग रोगी परिवहन में लगने वाले समय और लागत को काफी कम कर सकता है।
  • गंभीर देखभाल की निगरानी, जहाँ रोगी को स्थानांतरित करना संभव नहीं है।
  • चिकित्सा शिक्षा और नैदानिक ​​अनुसंधान जारी रखने में सहायता।
  • आपदा के दौरान चिकित्सीय सुविधाओं में किसी प्रकार की रुकावट नहीं।
  • टेलीमेडिसिन प्रौद्योगिकी के उपयोग से सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि दूरसंचार स्थापित होने के बाद यह चिकित्सा पद्धतियों में विशेषज्ञता ला सकता है।
  • रोबोट्स का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य टेलीमेटेड सर्जरी
  • यह महामारी की आशंका में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह स्थानीय और वैश्विक स्तर पर बीमारियों की रियल टाइम निगरानी में एक सक्षम विकल्प है। 

इस क्षेत्र में सरकार के प्रयास

  • संजीवनी- वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने टेलीमेडिसिन से संबंधित एक सॉफ्टवेयर जारी किया जिसे संजीवनी नाम दिया गया। इसे टेलीमेडिसिन के हाइब्रिड मॉडल के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जो ‘स्टोर और फॉरवर्ड’ के साथ-साथ रियल टाइम की अवधारणा का उपयोग करता है।
  • सेहत- वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन के ज़रिये विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अस्पतालों का नेटवर्क संचालित करने वाली कंपनी अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर 60 हजार कॉमन सर्विस सेंटरों (सीएससी-Common Service Centre) में टेलीमेडिसिन सेवा ‘सेहत’ शुरू की है।
  • कॉनटेक- कॉनटेक’ परियोजना दरअसल ‘कोविड-19 नेशनल टेलीकंसल्टेशन सेंटर’ का संक्षिप्त नाम है। यह एक टेलीमेडिसिन केन्द्र है जिसकी स्थापना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान., नई दिल्ली के द्वारा की गई है, जिसमें देश भर से विशेषज्ञों के बहु-आयामी सवालों का उत्तर देने के लिये विभिन्न नैदानिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध होंगे। यह एक बहु-मॉडल दूरसंचार केन्द्र है जिसके माध्यम से देश के अलावा विश्व के किसी भी हिस्से से दोनों ओर से ऑडियो-वीडियो वार्तालाप के साथ-साथ लिखित संपर्क भी किया जा सकता है।

इसके समक्ष चुनौतियाँ –

  • डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी ई-चिकित्सा या टेलीमेडिसिन के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त और परिचित नहीं हैं।
  • टेलीमेडिसिन के परिणामों के बारे में रोगियों में विश्वास की कमी है।
  • भारत में तकनीक और संचार लागत बहुत अधिक है, कभी-कभी यह टेलीमेडिसिन को वित्तीय रूप से अक्षम बना देती है।
  • भारत में, लगभग 40% जनसंख्या गरीबी के स्तर से नीचे रहती है। ऐसे में इस वर्ग का तकनीकी रूप से दक्ष होना अत्यधिक कठिन है।
  • विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर द्वारा समर्थित ई-चिकित्सा को अभी भी परिपक्व होने की आवश्यकता है। सही निदान और डेटा के अन्वेषण के लिये, हमें उन्नत जैविक सेंसर और अधिक बैंडविड्थ समर्थन की आवश्यकता है।
  • टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य सेवा के मामले में दिशानिर्देश बनाने व इन दिशानिर्देशों का उचित अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिये शासी निकाय का अभाव है।

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CURRENT AFFAIRS

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम -रासुका/ National Security Act-NSA:-

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगाए लॉकडाउन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाओं के देख अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सख्त फैसला ले रही है। राज्य सरकार की ओर से आदेश जारी किया गया है अब जो लोग भी पुलिसकर्मियों पर हमला करेंगे उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका (NSA) लगा दिया जाएगा।देश में कई जगहों पर पुलिस और स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले की खबरें आई हैं. बिहार के मुंगेर जिला के कासिमबाजार थाना क्षेत्र के हजरतगंज इलाके में कोरोना वायरस संक्रमण के संदिग्ध व्यक्ति की जांच के लिए नमूना लेने गयी डॉक्टरों और पुलिस की टीम पर स्थानीय लोगों ने पथराव किया।

इसके अलावा हाल ही में मुरादाबाद, राजस्थान के टोंक आदि में भी ऐसी घटनाएँ हुई है जँहा स्वास्थ्य कर्मी एवं सुरक्षा कर्मियों पर हमले हो रहे है । इसी संदर्भ में माँग की जा रही है कि यंहा भी U.P. की तरह NSA लागू किया जाए।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA):-

  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) का उपयोग केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा निवारक निरोध उपायों के रूप में किया जाता है।
  • NSA किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा उत्पन्न करने से रोकने हेतु केंद्र या राज्य सरकार को व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार देता है।
  • सरकार किसी व्यक्ति को आवश्यक आपूर्ति एवं सेवाओं के रखरखाव तथा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने से रोकने के लिये NSA के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती है।
  • किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने हिरासत में रखा जा सकता है। लेकिन सरकार को मामले से संबंधित नवीन सबूत मिलने पर इस समय सीमा को बढ़ाया जा सकता है।

NSA की पृष्टभूमि:-

  • भारत में निवारक निरोध कानून की शुरुआत औपनिवेशिक युग के बंगाल विनियमन- III, 1818 (Bengal Regulation- III, 1818 से मानी जाती है। इस कानून के माध्यम से सरकार, किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रियाओं से गुज़रे बिना सीधे ही गिरफ्तार कर सकती थी।
  • एक सदी बाद ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट, 1919 (Rowlatt Acts-1919) को लागू किया, जिसके तहत बिना किसी परीक्षण (Trial) के संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करने की अनुमति दी गई।
  • स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950 में निवारक निरोधक अधिनियम (Preventive Detention Act- PDA) बनाया गया, जो 31 दिसंबर, 1969 तक लागू रहा।
  • वर्ष 1971 में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act- MISA) लाया गया जिसे वर्ष 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया। बाद में कॉंग्रेस सरकार द्वारा पुन: NSA लाया गया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा कानून ,राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से जुड़ा एक कानून है।वर्तमान में यही क़ानून प्रभावी है।

NSA के साथ विवाद:-

  • मूल अधिकारों से टकराव:
    • सामान्यत: जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे कुछ मूल अधिकारों की गारंटी दी जाती है। इनमें गिरफ्तारी के कारण को जानने का अधिकार शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 22 (1) में कहा गया है कि एक गिरफ्तार व्यक्ति को परामर्श देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। हालाँकि निवारक निरोध के तहत गिरफ़्तारी हो सकती है।
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता से टकराव:
    • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code- Cr.PC) की धारा 50 के अनुसार गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार तथा जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिये। इसके अलावा Cr.PC की धारा 56 तथा 76 के अनुसार गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर एक व्यक्ति को अदालत में पेश किया जाना चाहिये। इनमें से कोई भी अधिकार NSA के तहत हिरासत में लिये गए व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है।
  • आँकड़ों की अनुपलब्धता:
    • National Crime Records Bureau- NCRB जो देश में अपराध संबंधी आँकड़े एकत्रित तथा उनका विश्लेषण करता है, NSA के तहत आने वाले मामलों को अपने आँकड़ों में शामिल नहीं करता है क्योंकि इन मामलों में कोई FIR दर्ज नहीं की जाती है। अत: NSA के तहत किये गए निवारक निरोधों की सटीक संख्या के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

स्रोत: THE HINDU

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NEWS ANALYSIS

World Health Organization financing/ विश्व स्वास्थ्य संगठन का वित्तीयन-

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि वह डब्ल्यूएचओ को अमेरिका द्वारा दी जाने वाली धनराशि को रोक देगा, अमेरिका ने यह आरोप लगाया कि कोरोना के प्रसार को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बेहतर प्रबंधित नहीं किया

WHO के वित्तीयन के सम्बंध में निम्नलिखित व्यवस्था है

  • यह बड़ी संख्या में देशों, परोपकारी संगठनों, संयुक्त राष्ट्र संगठनों आदि द्वारा वित्त पोषित है। डब्ल्यूएचओ द्वारा अपलोड की गई जानकारी के अनुसार, सदस्य राज्यों (जैसे अमेरिका) से स्वैच्छिक दान 35.41% योगदान करते हैं, मूल्यांकन योगदान 15.6%% है, परोपकारी संगठन खाते से 9.33% , संयुक्त राष्ट्र के संगठन लगभग 8.1% का योगदान करते हैं; शेष विभिन्न स्रोतों से आता है।
  • अमेरिका WHO की कुल फंडिंग का लगभग 15% और सदस्य राज्यों के वित्तीयन का लगभग 31% योगदान देता है, दोनों मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा है।
  • भारत सदस्य देशों के दान का 1% योगदान देता है (जो कि कुल WHO फंडिंग का .48% है)।
  • डब्ल्यूएचओ के कुल वित्तीय बजट का 5 प्रतिशत से अधिक योगदान अमेरिका के बाद यूके (7.79 प्रतिशत) और जर्मनी (5.68 प्रतिशत) द्वारा आता है ।
  • मानवीय मामलों के समन्वय के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNOCHA) 5 प्रतिशत से अधिक योगदान देने वाला अन्य निकाय है।
  • विश्व बैंक (3.42 प्रतिशत), रोटरी इंटरनेशनल (3.3 प्रतिशत), यूरोपीय आयोग (3.3 प्रतिशत) और जापान (2.7 प्रतिशत) डब्ल्यूएचओ के वित्त के अन्य प्रमुख योगदानकर्ताओं में से हैं।
  • डब्ल्यूएचओ के लिए, इसके कुल वित्त पोषण का लगभग 15% का नुकसान दुनिया भर में असर पड़ता है। हालाँकि, जब तक अन्य देश अमेरिका के समान कार्य नहीं करेंगे, तब तक इस कदम से डब्ल्यूएचओ के संचालन में गंभीर बाधा नहीं आ सकती है।
  • चीन, जो नॉवल कोरोनोवायरस महामारी के मद्देनजर मौजूदा डब्ल्यूएचओ विवाद के केंद्र में है, वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी में कुल धन का केवल 0.21 प्रतिशत प्रवाहित करता है।
  • वित्त पोषण की अगली बड़ी श्रेणी में जो मूल्यांकन योगदान किया जाता है वह सदस्यता शुल्क की तरह हैं।एक सदस्य के रूप में कोई भी राष्ट्र इस सदस्यता शुल्क से मुक्त नहीं रहा सकता
  • डब्ल्यूएचओ प्रत्येक सदस्य देश के लिए उसके वित्तीय स्वास्थ्य और जनसंख्या के आधार पर निर्धारित शुल्क का आकलन करता है। इसी कारण से, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, यूएस, कुल WHO फंडों में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देती है और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था 0.25 प्रतिशत से कम योगदान करती है ।
  • स्वास्थ फ़्लू महामारी के विश्व में प्रसारित होने के दो साल बाद, 2011 में स्वास्थ्य एजेंसी की कुल धनराशि के 17 प्रतिशत के लिए मूल्यांकन योगदान या डब्ल्यूएचओ सदस्यता शुल्क से आता है।

WHO का व्यय: –

  • विश्व स्वास्थय संगठन विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होता है। उदाहरण के लिए, 2018-19 में, 19.36% (लगभग $ 1 बीएन) पोलियो उन्मूलन पर खर्च किया गया था, आवश्यक स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं की बढ़ती पहुंच पर 8.77%, टीका निवारणीय रोगों पर 7% और प्रकोपों की रोकथाम और नियंत्रण पर लगभग 4.36% खर्च किया गया था।
  • अफ्रीका के देशों को डब्ल्यूएचओ परियोजनाओं के लिए $ 1.6 बिलियन प्राप्त हुआ; और दक्षिण पूर्व एशिया (भारत सहित) ने $ 375 मिलियन प्राप्त किए। भारत WHO दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र का एक सदस्य राज्य है।
  • अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ परियोजनाओं के लिए $ 62.2 मिलियन प्राप्त किए। यह वह क्षेत्र है जहाँ से विश्व स्वास्थय संगठन सर्वाधिक योगदान प्राप्त करता है तथा सबसे कम व्यय करता है

WHO की आलोचना का आधार :-

  • वायरस प्रसार के के प्रारंभिक चरण में जब कई राष्ट्रों द्वारा चीन पर व्यापारिक तथा यात्रा प्रतिबन्ध आरोपित किये गए तब विश्व स्वास्थय संगठन ने इस कदम का विरोध किया।
  • इसके साथ ही साथ अपनी प्रारंभिक वक्तव्यों में विश्व स्वास्थ्य संगठन मानव से मानव प्रसार को भी मान्यता नहीं देता रहा जिसके भयवाह परिणाम देखने को मिल रहे।

USA के इस कदम का वैश्विक प्रभाव :-

  • ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन का वित्तीयन रोका जाना इस प्रकार की प्रथम घटना नहीं है।  इसके पूर्व अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनो का वित्तीयन रोका गया है।  अमेरिका द्वारा इस प्रकार के कदम चीन को वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका  बढ़ाने का अवसर प्रदान कर  रहा है।
  • इस संकट के समय जब लगभग  महत्वपूर्ण देश कोरोना संकट से ग्रस्त है ऐसे में अमेरिका द्वारा वित्तीयन रोकना लगभग आधी आबादी को संकट में डालने वाला कदम है वरन यह अमेरिका का वैश्विक नेतृत्वकर्ता  रूप में क्षवि को भी धूमिल करता है
  • अमेरिका का यह कदम प्रखर संरक्षणवादी नीति का सूचक है तथा यदि इसका अनुशरण ब्रिटेन तथा जर्मनी जैसे देशो ने किया तो यह कोरोना के विरुद्ध वैश्विक प्रयास को  बड़ा आघात लगेगा ।
  • इसके पूर्व करोनाबोन्ड के मुद्दे पर जर्मनी के नेतृत्व में कई यूरोपियन देश सामूहिक उत्तरदायित्व का विरोध कर रहे हैं ऐसे में अमेरिका का यह कदम इस महामारी के विरुद्ध सामूहिक उत्तरदायित्व को कम करेगा जो वैश्वीकरण  सिद्धांतो के भी विरुद्ध होगा।

भारत का योगदान

  • जहाँ एक ओर कई विकसित देश अपनी वैश्विक भूमिका में कमी ला रहे वहीँ दूसरी तरफ भारत अपनी वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को दृढ़ता के साथ निभा रहा।  भारत द्वारा क्षेत्रीय व वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक ज्ञान ,नियम तथा हायड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को उपलब्ध कराकर अपनी वैश्विक भूमिका के साथ मानवता की रक्षा हेतु सराहनीय कदम उठाये गए हैं।

WHO तथा भारत

  • भारत 12 जनवरी, 1948 को WHO संविधान का पक्षकार बना। दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए WHO क्षेत्रीय समिति का पहला अधिवेशन 4-5 अक्टूबर, 1948 को भारत के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यालय में आयोजित किया गया, और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया। ।
  • भारत में डब्ल्यूएचओ टीकाकरण कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण भागीदार रहा है, टीबी से निपटने और राज्यों में कुष्ठ रोग और कालाजार, और पोषण कार्यक्रम जैसे उपेक्षित रोग के निदान में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही
  • कोरोना के निदान में भी भारत तथा विश्व स्वास्थय संगठन सहयोगी के रूप में कार्य कर रहे है
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CURRENT AFFAIRS

कोरोना को नियंत्रित करने के आगरा, भीलवाड़ा व पथानमथिट्टा मॉडल-

चर्चा में क्यों?—

आगरा, भीलवाड़ा और पथानमथिट्टा जिलों में शुरुआती मामलों के बाद, संबंधित राज्य और जिला प्रशासन ने उन भौगोलिक क्षेत्रों में प्रकोप को रोकने के लिए कड़ी मेहनत की और बहुत हद तक सफलता प्राप्त की इसलिए इन ज़िलो की कार्यप्रणाली को कोरोना को रोकने के रूप में देखा जा रहा है।

आगरा मॉडल:उत्तर प्रदेश

  • “आगरा मॉडल” मार्च के शुरू में आरम्भ हुआ । दो व्यक्ति जिन्होंने एक रिश्तेदार के साथ ऑस्ट्रिया की यात्रा की थी – बाद में दिल्ली का पहला COVID-19 मामला आगरा के लिए घर चला गया जहाँ,  कुछ दिनों के बाद, छह सकारात्मक मामले पाए गए। जिला प्रशासन और एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम कर्मियों द्वारा किए गए संपर्कों के लिए स्थानीयकृत अभी तक व्यापक रूप से तलाशी अभियान चलाया गया था।
  • आगरा के लोहामंडी में 3 किलोमीटर के दायरे में एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र,जिसे 2 बजे सकारात्मक रिपोर्ट आने के तुरंत बाद बंद कर दिया गया, और 1,248 टीमों ने 1,65,000 से अधिक घरों में सघन संपर्क किया।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा: “राज्य, जिला प्रशासन और सीमावर्ती कर्मचारियों ने अपने मौजूदा स्मार्ट सिटी को कमांड और कंट्रोल सेंटर (ICCC) के साथ वार रूम के रूप में उपयोग करके अपने प्रयासों का समन्वय किया।
  • क्लस्टर रोकथाम और प्रकोप रोकथाम योजनाओं के तहत, जिला प्रशासन ने महामारी  की पहचान की, नक्शे पर सकारात्मक पुष्टि वाले मामलों के प्रभाव को कम किया और जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई सूक्ष्म योजना के अनुसार एक विशेष कार्य बल तैनात किया।
  • हॉटस्पॉट्स को एक सक्रिय सर्वेक्षण और रोकथाम योजना के माध्यम से प्रबंधित किया गया था। क्षेत्र की पहचान उपकेंद्र से 3 किलोमीटर के दायरे में की गई थी, जबकि 5 किलोमीटर बफर जोन की पहचान क्षेत्र के रूप में की गई थी।
  • नियंत्रण क्षेत्र में, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को रोपित किया गया था। 1,248 टीमों में से प्रत्येक में 2 कर्मचारी थे जिनमें ANMs / ASHA / AWW शामिल थे, जो घरेलू स्क्रीनिंग के माध्यम से 9.3 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई । इसके अतिरिक्त, पहले संपर्क ट्रेसिंग का प्रभावी और प्रारंभिक ट्रैकिंग पूरी तरह से मैप किया गया था।
  • आगरा मॉडल महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उच्च  घनत्व के क्षेत्रों में प्रभावी साबित हुआ है, जिन्हें “हॉटस्पॉट” कहा जा रहा है। आधिकारिक बयान में आगरा सामुदायिक प्रसारण का सबसे पहला उदाहरण  था।
  • सामुदायिक संचरण तब होता है जब ऐसे मामलों का पता लगना शुरू हो जाता है, जहां किसी प्रभावित देश में यात्रा के इतिहास के स्पष्ट संकेत  मिलते हैं, या एक पुष्टि किए गए सकारात्मक मामले के साथ संपर्क होता है। एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया जैसे विशेषज्ञ अब हॉटस्पॉट्स में “स्थानीयकृत सामुदायिक प्रसारण” के बारे में बात कर रहे हैं।

भीलवाड़ा मॉडल-राजस्थान

DM-भीलवाड़ा
  • राजस्थान का भीलवाड़ा COVID-19 का प्रारंभिक केंद्र था। यहाँ के प्रशासन ने ” नियंत्रण रणनीति” का प्रयोग किया , जिसे “भीलवाड़ा मॉडल” भी कहा जा रहा है।
  • जिला कलेक्टर कार्यालय द्वारा 26 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, 19 मार्च को भीलवाड़ा में पहला कोरोना मामला, एक निजी अस्पताल में एक डॉक्टर था। 26 मार्च तक, अस्पताल में सकारात्मक मामलों की संख्या 17 थी, उनमें से सभी अस्पताल के कर्मचारी और रोगी थे।
  • प्रकोप राजस्थान सरकार के लिए एक बड़े संकट के रूप में उभरा, क्योंकि डॉक्टरों ने सकारात्मक परीक्षण करने से पहले, नर्सिंग स्टाफ और रोगियों सहित कई लोगों के साथ संवाद किया था।
  • धारा 144 सीआरपीसी लागू होने के साथ शहर पूरी तरह से आइसोलेट हो गया था। पहले चरण में, आवश्यक सेवाओं की अनुमति दी गई थी; दूसरे चरण में, शहर और जिले की सीमाओं को बंद कर दिया गया और हर प्रवेश और निकास बिंदु पर चेकपोस्ट स्थापित किए गए।
  • सभी ट्रेनों, बसों और कारों को रोक दिया गया। पड़ोसी जिलों के जिलाधिकारियों को भी अपनी सीमाओं को सील करने के लिए कहा गया था। नियंत्रण क्षेत्र आम तौर पर उपरिकेंद्र के आसपास 3 किमी है, और बफर क्षेत्र 7 किमी स्थापित किया गया।
  • कंटेंट और बफर जोन को Move नो-मूवमेंट ’जोन में बदल दिया गया और COVID-19 मामलों के लिए क्लस्टर मैपिंग की गई।
  • इसके माध्यम से, छह क्षेत्रों की पहचान की गई और संदिग्ध मामलों की निरंतर जांच के लिए विशेष टीमों को तैनात किया गया। नियंत्रण और बफर ज़ोन, सभी एम्बुलेंस और पुलिस वाहन, स्क्रीनिंग सेंटर और संगरोध केंद्र, कलेक्ट्रेट, पुलिस लाइन और अन्य सार्वजनिक-व्यवहार कार्यालयों को दैनिक आधार पर कीटाणुरहित किया गया।
  • अंतिम गणना में, भीलवाड़ा में 3,072 टीमों ने 2,14,647 घरों का सर्वेक्षण किया था, जिसमें 10,71,315 लोग शामिल थे और इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों के 4,258 मामले पाए गए जिन्हें COVID-19 के लिए परीक्षण किया जाना था।
  • चार निजी अस्पतालों को 25 अलग-अलग बेड के साथ अधिग्रहित किया गया था। 1,541 कमरों के साथ 27 होटलों में केंद्र स्थापित किए गए थे, जिसमें अंततः 950 लोगों को कवारन्टाइन रखा गया था, जबकि 7,620 लोगों को घर कवारन्टाइन में रखा गया था।
  • आवश्यक किराने, फल, सब्जियों और दूध की डोर-टू-डोर आपूर्ति थी। कच्चे और पके हुए खाने के पैकेट जरूरतमंदों को बांटे गए और उद्योगों, कारखानों और ईंट-भट्टों के मजदूरों हेतु पूर्ण व्यवस्था थी ।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भीलवाड़ा में लगभग 28 मामले हैं।

पठानमथिट्टा मॉडल-केरल

  • केरल में पथानामथिट्टा मॉडल की पहचान रही है। इस जिले में मार्च के प्रारम्भ में अपने पहले मामलों को देखा, जब इटली के एक तीन-सदस्यीय परिवार ने कई रिश्तेदारों को संक्रमित किया ।
  • सीमा सील और संपर्क अनुरेखण भी यहाँ हुआ। लेकिन केवल स्क्रीनिंग संपर्कों से अधिक, जिले में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जांच की गई और एक डेटाबेस बनाया गया ताकि वे आसानी से कम सूचना पर पहुंच सकें।
  • इसके अतिरिक्त , कोरोना सकारात्मक मामलों के यात्रा मार्ग को दिखाते हुए ग्राफिक्स बनाए गए और प्रचारित किया गया। इसमें उन सभी स्थानों का विवरण शामिल था जिसमे परिवार ने यात्रा की थी, और उन्होंने 29 फरवरी से 6 मार्च के बीच संभावित संपर्क बनाए थे।
  • जब लोगों को मार्ग के नक्शे से पता चला कि वे वास्तव में एक सीओवीआईडी -19 पॉजिटिव व्यक्ति के संपर्क में आए हैं, तो कई लोग स्क्रीनिंग या इलाज के लिए चले गए।
  • कवारन्टाइन के तहत प्रतिदिन पूरी तरह से जांच की जाती थी, यहां तक कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की 14 टीमों ने 4,000 लोगों की निगरानी की, जिन्होंने इसकी सीलिंग से पहले जिले में प्रवेश किया था।
  • आईएचआरडी कॉलेज, चेंगन्नूर के इंजीनियरिंग छात्रों द्वारा डिज़ाइन किया एक ऐप – कोरोना आरएम भी प्रयुक्त किया गया। होम कवारन्टाइन के अंतर्गत आने वालों पर इस ऐप के जरिए नजर रखी गई जिससे उनके ठिकाने पर नजर रखी जा सकती है और अगर उन्होंने कवारन्टाइन को तोड़ा तो जीपीएस के प्रयोग से इसका तुरंत पता लगाया जा सकता है।
  • इन सबके प्रभाव से केरल में पिछले दिनों में नए मामलों की वृद्धि धीमी हो गई है।
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CURRENT AFFAIRS

देखो अपना देश: पर्यटन मंत्रालय का कार्यक्रम/Dekho Apna Desh

मानव जीवन पर कोविड-19 का प्रभाव सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बहुत ज्यादा पड़ा है। इसके कारण पर्यटन, एक क्षेत्र के रूप में, स्वाभाविक रूप से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि घरेलू स्तर पर या सीमा पार से कोई आवागमन नहीं हो पा रहा है। लेकिन प्रौद्योगिकी के कारण, स्थानों और गंतव्यों तक आभासी रूप से पहुंचना और बाद के दिनों के लिए अपनी यात्रा की योजना बनाना संभव है। इन अभूतपूर्व समय में, मानव संपर्क को बनाए रखने के लिए प्रौद्योगिकी काम आ रही है और यह भी विश्वास है कि फिर से यात्रा करने के लिए जल्द ही समय अच्छा हो जाएगा।

इसको ध्यान में रखते हुए, पर्यटन मंत्रालय ने आज से अपनी ‘देखोअपनादेश” नामक वेबिनार श्रृंखला की शुरूआत की है जिससे हमारे अतुल्य भारत की संस्कृति और विरासत की गहरी और विस्तृत जानकारी प्रदान की जा सके। पहली वेबिनार, जो एक श्रृंखला का हिस्सा थी और प्रकाशित हुई, इसने दिल्ली के लंबे इतिहास को छूआ और यह 8 शहरों के रूप में सामने आया। प्रत्येक का चरित्र अपने आप में अद्वितीय था और जिसने अपने पीछे अवशेषों को छोड़ा, जिसके कारण दिल्ली एक शानदार शहर बना, जो कि वह आज है। इस वेबिनार का शीर्षक “सिटी ऑफ सिटीज- दिल्लीज पर्सनल डायरी” था।

केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), ने कहा कि वेबिनारों की श्रृंखला एक निरंतर विशिष्टता वाली होगी और मंत्रालय अपने स्मारकों, पाक शैलियों, कलाओं, नृत्य के रूपों सहित भारत के विविध और उल्लेखनीय इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करने की दिशा में काम करेगा, जिसमें प्राकृतिक परिदृश्य, त्योहार और समृद्ध भारतीय सभ्यता के कई अन्य पहलू भी शामिल हैं।

इस सत्र का मूल पर्यटन जागरूकता और सामाजिक इतिहास पर आधारित है। दिलचस्प उपाख्यानों से सजी हुई इस सत्र का आयोजन, पर्यटन मंत्रालय के लिए इंडिया सिटी वॉक द्वारा किया गया, जिसमें 5,546 पंजीकृत व्यक्तियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही और इसमें कई रोचक प्रश्न भी पूछे गए जो प्रतिभागियों की दिलचस्पी को दर्शाते हैं। इस वेबिनार को जल्द ही सार्वजनिक डोमेन के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। यह इंस्टाग्राम और फेसबुक के माध्यम से मंत्रालय के सोशल मीडिया हैंडल- अतुल्य भारत पर उपलब्ध होगा।

देखोअपनादेश” वेबिनार श्रृंखला जारी रहेगी और भारत की विविधता, उल्लेखनीय इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करने की दिशा में मंत्रालय काम करता रहेगा: प्रह्लाद सिंह पटेल( संस्कृति मंत्री)

स्रोत-PIB

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SCIENCE AND TECHNOLOGY

कोविड-19 के लिए नवीन “कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी / New Convalescent plasma therapy for COVID-19

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक राष्ट्रीय महत्व के संस्थान श्री चित्र तिरुनल इंस्टीच्यूट फार मेडिकल साईंसेज एंड टेक्नोलाजी (एससीटीआईएमएसटी) ने कोविड-19 रोग से ग्रसित मरीजों को नवोन्मेषी उपचार प्रदान करने के लिए एक निर्भीक कदम उठाने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। तकनीकी रूप से ‘ कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी‘ (convalescent-plasma therapy) कहे जाने वाले इस उपचार का उद्वेश्य किसी बीमार व्यक्ति के उपचार के लिए ठीक हो चुके व्यक्ति द्वारा हासिल प्रतिरक्षी शक्ति का उपयोग करना है।

भारत के शीर्ष प्राधिकारी निकाय भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने एससीटीआईएमएसटी को यह नवीन उपचार करने के लिए मंजूरी दे दी है। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘ हमने ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया (डीसीजीआई) को रक्तदान के नियमों में ढील की अनुमति के लिए एज कटआफ हेतु आवेदन किया है।

क्या है कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी : जब एक पैथोजेन की तरह का नोवेल कोरोना वायरस संक्रमित करता है तो हमारी प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का उत्पादन करती है। पुलिस के कुत्तों की तरह एंटीबाडीज आक्रमणकारी वायरस की पहचान करते हैं और चिन्हित करते हैं। श्वेत रक्त कोशिकाएं पहचाने गए घुसपैठियों को संलगन करती हैं और शरीर संक्रमण से मुक्त हो जाता है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन की तरह ही यह थेरेपी ठीक हो चुके व्यक्ति से एंटीबाडी को एकत्रित करती है और बीमार व्यक्ति में समावेशित कर देती है।

 एंटीबाडीज क्या होते हैं?: एंटीबाडीज किसी माइक्रोब द्वारा किसी संक्रमण की अग्रिम पंक्ति प्रतिरक्षी अनुक्रिया होते हैं। वे नोवेल कोरोना वायरस जैसे किसी आक्रमणकारी का सामना करते समय बी लिम्फोसाइट्स नामक प्रतिरक्षी कोशिकाओं द्वारा स्रावित विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं। प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज की रूपरेखा तैयार करते हैं जो प्रत्येक आक्रमणकारी पैथोजेन के प्रति काफी विशिष्ट होते हैं। एक विशिष्ट एंटीबाडी और इसका साझीदार वायरस एक दूसरे के लिए बने होते हैं।

यह उपचार किस प्रकार दिया जाता है?: जो व्यक्ति कोविड-19 की बीमारी से ठीक हो चुका है, उससे खून निकाला जाता है। वायरस को बेअसर करने वाले एंटीबाडीज के लिए सीरम को अलग किया जाता है और जांचा जाता है। कन्वलसेंट सीरम, जोकि किसी संक्रामक रोग से ठीक हो चुके व्यक्ति से प्राप्त ब्लड सीरम है और विशेष रूप से उस पैथोजेन के लिए एंटीबाडीज में समृद्ध है, को तब कोविड-19 के रोगी को दिया जाता है। रोगी निष्क्रिय प्रतिरक्षण प्राप्त कर लेता है। डा. किशोर ने इंडिया साईंस वायर से बातचीत करते हुए बताया कि ,‘ ब्लड सीरम निकालने और रोगी को दिए जाने से पहले संभावित डोनर की जांच की जाती है। पहली बात यह कि स्वाब टेस्ट निगेटिव होनी चाहिए और संभावित डोनर को स्वस्थ घोषित होना चाहिए। इसके बाद ठीक हो चुके व्यक्ति को दो सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए। या फिर संभावित डोनर को कम से कम 28 दिनों तक अलक्षणी होना चाहिए। इनमें से दोनों ही अनिवार्य हैं। ‘

कौन यह उपचार प्राप्त करेगा?: डा. किशोर ने बताया कि, ‘ आरंभ में हम कुछ ही रोगियों पर इसका प्रयास करेंगे। वर्तमान में इसकी अनुमति केवल बुरी तरह से संक्रमित रोगियों के लिए सीमित उपयोग हेतु एक प्रायोगिक थेरेपी के रूप में दी गई है। ‘

यह टीकाकरण से अलग कैसे है? यह  थेरेपी निष्क्रिय टीकाकरण के समान है। जब कोई टीका दिया जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का निर्माण करती है। इस प्रकार, बाद में जब टीका प्राप्त कर चुका व्यक्ति उस पैथोजेन से संक्रमित हो जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज स्रावित करती है और संक्रमण को निष्प्रभावी बना देती है। टीकाकरण जीवन पर्यंत प्रतिरक्षण देता है। निष्क्रिय एंटीबाडी थेरेपी के मामले में, इसका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक इंजेक्ट किए गए एंटीबाडीज खून की धारा में रहते हैं। दी गई सुरक्षा अस्थायी होती है। इससे पहले कि कोई शिशु अपना खुद का प्रतिरक्षण तैयार करे, माता अपने दूध के जरिये एंटीबाडीज अंतरित करती है।

इतिहास: 1890 में, जर्मनी के फिजियोलाजिस्ट इमिल वान बेहरिंग ने खोज की थी कि डिपथिरिया से संक्रमित एक खरगोश से प्राप्त सीरम डिपथिरिया संक्रमण को रोकने में प्रभावी है। बेहरिंग को 1901 में दवा के लिए सर्वप्रथम नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस समय एंटीबाडीज ज्ञात नहीं था। कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी कम प्रभावी था और इसके काफी साइड इफेक्ट थे। एंटीबाडीज फ्रैक्शन को अलग करने में कई वर्ष लगे। फिर भी अलक्षित एंटीबाडीज और अशुद्धियों के कारण साइड इफेक्ट होते रहे।

क्या यह प्रभावी है ? हमारे पास बैक्टिरियल संक्रमण के खिलाफ काफी एंटीबायोटिक्स हैं। तथापि, हमारे पास प्रभावी एंटीवायरल्स नहीं हैं। जब कभी कोई नया वायरल प्रकोप होता है तो इसके उपचार के लिए कोई दवा नहीं होती। इसलिए, कन्वलसेंट सीरम का उपयोग पिछले वायरल महामारियों के दौरान किया गया है। 2009-10 के एच1एन1 इंफ्लुएंजा वायरस महामारी के प्रकोप के दौरान इंटेसिंव केयर की आवश्यकता वाले संक्रमित रोगियों का उपयोग किया गया। निष्क्रिय एंटीबाडी उपचार के बाद, सीरम उपचारित रोगियों ने नैदानिक सुधार प्रदर्शित किया। वायरल को बोझ कम हुआ और मृत्यु दर में कमी किया जा सका। यह प्रक्रिया 2018 में इबोला प्रकोप के दौरान भी उपयोगी रही।

 क्या यह सुरक्षित है ? आधुनिक ब्लड बैंकिंग तकनीक जो रक्त जनित पैथोजीन की जांच करते हैं, मजबूत है। डोनर एवं प्राप्तकर्ता के खून के प्रकारों को मैच करना मुश्किल नहीं है। इसलिए, अनजाने में ज्ञात संक्रमित एजेंटों को ट्रांसफर करने या ट्रांसफ्यूजन रियेक्शन पैदा होने के जोखिम कम हैं। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘जैसाकि हम रक्तदान के मामलों में करते हैं, हमें ब्लड ग्रुप एवं आरएच अनुकूलता का ध्यान रखना होता है। केवल वही लोग जिनका ब्लड ग्रुप मैच करता है, खून दे या ले सकते हैं। खून देने की अनुमति दिए जाने से पूर्व डोनर की सख्ती से जांच की जाएगी तथा कुछ विशेष अनिवार्य कारकों का परीक्षण किया जाएगा। उनकी हेपाटाइटिस, एचआईवी, मलेरिया आदि की जांच की जाएगी जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे रिसीवर को अलग पैथोजेन न हस्तांतरित कर दे। ‘

एंटीबाडीज प्राप्तकर्ता में कितने समय तक बना रहेगा ? जब एंटीबाडी सीरम दिया जाता है तो तो यह प्राप्तकर्ता में कम से कम तीन से चार दिनों तक बना रहेगा। इस अवधि के दौरान बीमार व्यक्ति ठीक हो जाएगा। अमेरिका एवं चीन की अनुसंधान रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि ट्रांसफ्यूजन प्लाज्मा के लाभदायक प्रभाव पहले तीन से चार दिनों में प्राप्त होते हैं, बाद में नहीं।

चुनौतियां: मुख्य रूप से जीवित बचे लोगों से प्लाज्मा की उल्लेखनीय मात्रा प्राप्त करने में कठिनाई के कारण यह थेरेपी उपयोग में लाये जाने के लिए सरल नहीं है। कोविड-19 जैसी बीमारियों में, जहां अधिकांश पीड़ित उम्रदराज हैं और हाइपरटेंशन, डायबिटीज और ऐसे अन्य रोगों से ग्रसित हैं, ठीक हो चुके सभी व्यक्ति स्वेच्छा से रक्त दान करने के लिए तैयार नहीं होंगे।

स्रोत-PIB

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ECONOMY

भारत का GDP वृद्धि दर वित्त वर्ष 2020-21 में 4.8 प्रतिशत रहने का अनुमान : UNO क़ा विश्लेषण।

संयुक्त राष्ट्र के ‘एशिया और प्रशांत आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण (ESCAP)’ वर्ष 2020 की ओर से स्थायी अर्थव्यवस्थाओं के लिए जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 4.8 फ़ीसदी रहने का अनुमान है। यह भविष्यवाणी 10 मार्च, 2020 तक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर की गई थी।

वर्ष 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी 5 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था और विकास दर में वर्ष 2020-21 में 4.8 तक गिरावट का अनुमान है।इस रिपोर्ट में वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 5.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है।

पिछले कुछ महीनों में भारत की जीडीपी में काफी गिरावट आई है, इसकी वजह रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और एविएशन सेक्टर में मांग कम होना और क्रेडिट लिमिट का कम होना है. भारत की जीडीपी जुलाई-सितंबर 2019 की तिमाही में अपने पिछले 7 वर्षों में सबसे कम 4.5 फ़ीसदी थी।आय में कमी और बढ़ती बेरोजगारी ने भी भारत में विकास दर को धीमा किया है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में अनुमानित वृद्धि —👇🏻

केंद्रीय बजट 2020-21 से एक दिन पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद 6-6.5 फ़ीसदी तक बढ़ने का अनुमान लगाया गया है जोकि वर्ष 2019-20 में 5 फ़ीसदी था।

एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर कोविड -19महामारी का प्रभाव—-👇🏻

UN ESCAP रिपोर्ट 2020 में कहा गया है कि कोविड -19 महामारी के प्रकोप की वजह से अन्य देशों के साथ होने वाले पर्यटन, व्यापार और अन्य वित्तीय क्रियाकलापों में कमी के कारण एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

• 31 मार्च, 2020 तक कोविड – 19 के मामले लगातार बढ़ने के साथ ही नोवल कोरोनो वायरस महामारी पूरी दुनिया में तेजी से फैल रही है. कोविड-19 महामारी सबसे पहले चीन के वुहान शहर में बड़ी तेजी से फ़ैली और जल्दी ही पूरी दुनिया के कई देशों में फैल गई।

कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कई उपाय जैसेकि लॉकडाउन, क्वारंटाइन और अन्य कई उपाय अपनाये जाने के बावजूद, इस महामारी ने पहले ही एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के साथ विश्व की अधिकतर अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।

• कोविड-19 के परिणामस्वरूप, UN ESCAP रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारिक गतिविधियों में कमी के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जीडीपी में 0.6-0.8 फ़ीसदी तक की गिरावट आ सकती है।

विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर रहेगा जारी-👇🏻

वर्ष 2008 की तुलना में वित्त वर्ष 2019-20 में, विश्व अर्थव्यवस्था 2.3 फ़ीसदी की धीमी गति से बढ़ी, जबकि वर्ष 2018 में यह जीडीपी 3 फ़ीसदी थी. वर्ष 2020 में विश्व अर्थव्यवस्था के 2020-21 में 2.0 फ़ीसदी की वृद्धि के साथ धीमा होने की उम्मीद है.  

इसके अलावा, एशिया-प्रशांत क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मंदी को भारत, चीन और रूस जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने और अधिक बढ़ाया है।

UN ESCAP रिपोर्ट में सुझाए गए समाधान-👇🏻

विश्व अर्थव्यवस्था पर कोविड -19 के प्रभाव को दूर करने के लिए, एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सभी देशों सहित विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए और आपस में समन्वय और सहयोग को मजबूत करना चाहिए।