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DISCUSSION SCIENCE AND TECHNOLOGY

COVID-19 के दौर में नवीन प्रौद्योगिकी का प्रयोग/ Use of new Technology in the era of COVID-19

  • COVID-19 के लॉकडाउन के कारण, भारत को भोजन, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
  • कोविद -19 महामारी ने भारत में कई उद्योगों को प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए अप्रत्याशित रूप से उत्प्रेरित किया है।
  • एक विस्तारित लॉकडाउन से प्रेरित होकर, लोग नियमित ,खाद्य-वितरण, चिकित्सा परामर्श या शिक्षा कार्यों के लिए नए समाधान की तलाश कर रहे हैं।
  • “अपने स्वास्थ्य के बारे में सूचित या सुरक्षित रहने के लिए, प्रौद्योगिकियों का उपभोक्ता, तनावपूर्ण अवधि में विश्वास पैदा कर सकता है, और यह प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों और समाधानों के व्यापक, दीर्घकालिक अपनाने पर जोर देने के लिए अप्रत्याशित उत्प्रेरक हो सकता है।
  • ब्रांड्स, अपने घरों तक ही सीमित रहने वाले उपभोक्ताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए, पुराने और नए के बीच उपन्यास गठजोड़ की जा रही है।
  • उदाहरण के लिए, सुपरमार्केट चेन बिग बाजार ने आवश्यक सामान पहुंचाने के लिए बाइक एग्रीगेटर रैपिडो और फूड डिलीवरी सर्विस स्कूटी की भागीदारी की है। इस बीच, मैरिको जैसे उपभोक्ता दिग्गज, उत्पादों की डिलीवरी के लिए फूड एग्रीगेटर ज़ोमैटो और स्विगी का प्रयोग कर रहे हैं।
  • यहां तक कि सरकार निगरानी के लिए नए तरीके अपना रही है, जो आने वाले दिनों में सामान्य हो सकते हैं।

तकनीकी का विभिन्न क्षेत्र में प्रयोग:-

टेलीमेडिसिन में प्रयोग

  • इस उभरते हुए क्षेत्र ने कुछ समय के लिए स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को स्मार्टफ़ोन और वीडियो कॉल पर दूरस्थ स्थानों में रोगियों का निदान करने की अनुमति दी है। परन्तु यह क्षेत्र न केवल स्वयं बढ़ रहा , बल्कि तेजी से देश में दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है।
  • प्रैक्टो, पोर्टिया और लाइबेट जैसे स्टार्टअप, जो रिमोट मेडिकल चेकअप की सुविधा प्रदान करते हैं। वे “एक सामाजिक दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि नर्सिंग होम, और अस्पताल के वेटिंग रूम में वायरस न पहुंचे।
  • इसकी अपरिहार्यता को महसूस करते हुए, भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने लॉक डाउन में 25 मार्च को टेलीमेडिसिन के लिए नए दिशानिर्देशों को रेखांकित करते हुए एक दस्तावेज़ जारी किया।
  • कोरोनवायरस-संबंधी चिंताओं से परे, लोग अन्य मुद्दों के लिए कॉल और चैट की ओर भी रुख कर रहे हैं। डायबिटीज देखभाल और प्रबंधन ऐप बीटीओ रोगियों को अपने नियमित चिकित्सक को प्लेटफॉर्म पर जोड़ने का विकल्प देकर वास्तविक जीवन के अनुभव का अनुकरण करने की कोशिश कर रहा है।

ओपन-सोर्स डिजाइन में प्रयोग

  • कोविद -19 से लड़ने वाले स्वास्थ्य सेवा और फ्रंटलाइन श्रमिकों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) की कमी ने खुले स्रोत के डिजाइन का उपयोग करके बड़े पैमाने पर विनिर्माण को अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
  • टेक इनोवेटर्स, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अलावा, विभिन्न हैकथॉन के लिए वेंटिलेटर, परीक्षण किट, संपर्क ट्रेसिंग के लिए एप्लिकेशन और लिफ्ट और बाकी कमरों के लिए संपर्क रहित डिवाइस बनाने के लिए अन्य सुविधाओं के निर्माण हेतु कॉल किया है। कुछ ने कार्यशील प्रोटोटाइप बनाने में भी सफलता प्राप्त की है।
  • मेकर असाइलम, जो मुंबई और नई दिल्ली में एक सामुदायिक हैकरस्पेस है, ने हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए फेस शील्ड्स तैयार किए हैं। एम -19 शील्ड को प्रोटोटाइप के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए किसी के द्वारा केवल तीन मिनट में बनाया जा सकता है। प्रत्येक फेस शील्ड को रु 55 से कम के लिए बनाया जा सकता है। निर्माता की शरण का अनुमान है कि देश में 500 हैकरस्पेस हैं जो एम -19 के डिजाइन को दोहरा सकते हैं जो स्वयं खुला स्रोत है और सॉफ्टवेयर विकास प्लेटफॉर्म GitHub पर प्रकाशित किया गया है।
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग शोधकर्ताओं की टीम से एक और महत्वपूर्ण नवाचार आया है। इसने एक पूर्ण पीपीई किट विकसित की है, जब बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है, तो इसकी कीमत 100 रुपये से कम होगी।

ऑनलाइन शिक्षा में प्रयोग

  • मार्च में भारत के स्कूल और शैक्षणिक संस्थान बंद हो गए, शिक्षा प्रौद्योगिकी, या एड-टेक, नितांत रूप से आवश्यक हो गए।
  • कौरसेरा जैसे प्लेटफार्मों को भारत में एक बड़े ग्राहक आधार के रूप में देखते हुए, उन्हें पारंपरिक लोगों के विकल्प के बजाय शिक्षा के पूरक तरीकों के रूप में देखा गया। इसके अलावा, एड-टेक विशेष पाठ्यक्रम और मॉड्यूल तक सीमित था।
  • शहरी भारत में बड़ी संख्या में स्कूल ऑनलाइन कक्षाओं में स्थानांतरित हो गए हैं।
  • हालाँकि, यह चिंता छोटे शहरों और गाँवों में है, जिनमें से इंटरनेट बुनियादी ढाँचा नहीं है। फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के व्यापक रूप से अपनाने के कारण अंततः ई-तकनीक को बढ़ावा मिलेगा, जो कुलीन संस्थानों और आबादी व्यय सीमा में आ सके है।

निगरानी रखने में

  • भारत के अस्पतालों से भागकर और घर से बाहर रहने वाले लोगों के साथ घबराहट के कारण, अधिकारियों को निगरानी तकनीकों को स्वीकारने के लिए मजबूर किया गया।
  • कुछ ही समय में, सेलफोन जैसे व्यक्तिगत उपकरणों को कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई में तैनात किया गया था। सामान्य परिस्थितियों में, इससे निजता की चिंता बढ़ जाती।
  • भारत सरकार ने 6 अप्रैल को आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया।
  • कर्नाटक सरकार ने 18 मार्च को राज्य विधान सभा को सूचित किया कि वह लोगों के फोन को क्वारंटआइन ट्रैक करेगी। इसके अतिरिक्त, कर्नाटक में घर से बाहर रहने वाले व्यक्तियों को क्वारेंटाइन वॉच एंड्रॉइड के माध्यम से हर घंटे अपनी सेल्फी अपलोड करनी होती है।
  • एक अन्य दक्षिणी राज्य केरल रोगियों को ट्रैक करने के लिए स्थान डेटा और सीसीटीवी फुटेज का उपयोग कर रहा है। अधिकारियों ने कोरोनोवायरस रोगियों के प्राथमिक और द्वितीयक संपर्कों को ट्रैक करने के लिए कॉल रिकॉर्ड और जीपीएस का भी उपयोग किया है।

ड्रोन तकनीक का प्रयोग

  • भारत अभी तक इस तकनीक में बहुत आगे नहीं बढ़ा है। COVID-19 के दौरान पुलिस और नागरिक अधिकारियों ने इसके उपयोग की बात की है ।
  • हवाई निगरानी बड़े समारोहों को ट्रैक करने में मदद करती है, भौतिक संपर्क को कम करती है और संकीर्ण वाहनों की निगरानी करती है जहां पुलिस वाहन प्रवेश नहीं कर सकते हैं। उनका उपयोग सार्वजनिक स्थानों और आवासीय कॉलोनियों में कीटाणुनाशक स्प्रे करने के लिए भी किया जा सकता है।
  • भविष्य में, ड्रोन गोपनीयता के मुद्दों को जन्म दे सकते हैं।
  • एक संतुलन को एक मजबूत ढांचे के भीतर स्थापित किया जाना चाहिए, जो सामुदायिक कल्याण की मांग करते हुए नागरिक अधिकारों को मान्यता देता है।

प्रौद्योगिकी के प्रयोग से लाभ :-

  • यह लॉक डाउन से होने वाले आर्थिक हानियों को कम करने में सहायक होगा एक अनुमान के अनुसार 2025 तक, भारत 800 बिलियन डॉलर से 1 ट्रिलियन (देश के नाममात्र जीडीपी के 18-23 प्रतिशत के बराबर मूल्य) की डिजिटल अर्थव्यवस्था बना सकता है।
  • यह शैक्षिक हानि को भी कम करेगा। विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम को स्वीकरना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
  • आरोग्य सेतु जैसे एप्स सोशल डिस्टेंसिंग के साथ के वास्तविक तत्वार्थ को सिद्ध करेगा।
  • यह डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं को प्रेरित करेगा।
  • ई -नाम जैसी तकनीक कृषि विपणन में सहायक होंगी।

प्रौद्योगिकी के प्रयोग से हानियां-

  • यह आगे चलकर लोगों की निजता को प्रभावित कर सकता है।
  • अभी भी भारत में डिजिटल निरक्षरता व्यापक रूप से प्रभावी है। इसके परिणाम स्वरूप लोगों के साथ अनेक प्रकार की धोखाधड़ी की सम्भावना बनी रहतीहै।

प्रौद्योगिकी के सामने चुनोतियां-

1. भारत की सामान्य जनता नवीन तकनीक से अपडेट नही है।

2. भारत के ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी इंटरनेट की अच्छी गति नही है।

3. भाषा एक बड़ी चुनोति है अधिकांश लोगों को अंग्रेज़ी की समझ नही है जबकि सूचनाएँ मुख्यतः अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध होती है.

4. भारत में इस क्षेत्र में निवेश की दर अन्य देशों से काफ़ी कम है।

5. उच्च प्रोधोगिकी के प्रयोग के लिए अधिक मात्रा में धन की ज़रूरत होती है जबकि एक बड़ी आबादी ग़रीबी में जीवन जी रही है।

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CURRENT AFFAIRS SCIENCE AND TECHNOLOGY

Telemedicine: A New Horizon in Public Health / टेलीमेडिसिन: सार्वजनिक स्वास्थ्य में एक नया क्षितिज-

वर्तमान में ‘टेलीमेडिसिन’ जिसे ई-स्वास्थ्य सुविधा का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है, कि आवश्यकता को महसूस किया जा रहा है। इस समय संपूर्ण देश की स्वास्थ्य अवसंरचना COVID-19 महामारी के प्रसार को रोकने में लगी हैं। ऐसे में अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों के समक्ष चिकित्सीय सुविधाओं को प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। भारत में टेलीमेडिसिन और टेलीहेल्थ के वर्तमान परिदृश्य का मूल्यांकन करने का यह सही समय है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अध्ययन में यह पाया गया कि टेलीमेडिसिन भारत की संपूर्ण जनसंख्या के लिये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि कर सकता है, इससे मुख्यतः ग्रामीण आबादी अत्यधिक लाभान्वित होगी।

टाइम पत्रिका ने टेलीमेडिसिन को ‘हीलिंग बाई वायर’ (healing by wire) के नाम से संबोधित किया है। हालाँकि प्रारंभ में इसे ‘भविष्यवादी’ और ‘प्रायोगिक’ माना जाता था, लेकिन टेलीमेडिसिन आज एक वास्तविकता है। निश्चित ही भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के कार्मिक कंप्यूटर के कुशल जानकार नहीं हैं, वस्तुतः चिकित्सा में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के संबंध में जागरूकता और जोखिम की कमी है। ये भारत में टेलीमेडिसिन के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। निस्संदेह, हमें तकनीकी जागरूकता की कमी को रुकावट नहीं बनने देना चाहिये और नवाचारों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये।

क्या है टेलीमेडिसिन?-

  • टेलीमेडिसिन स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की एक उभरती हुई विधा है जहाँ सूचना प्रौद्योगिकी के साथ चिकित्‍सा विज्ञान के सहक्रियात्‍मक संकेन्‍द्रण से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्‍वास्‍थ्‍य के विभिन्न क्षेत्र जैसे- शिक्षा, प्रशिक्षण और प्रबंधन के अनेक अनुप्रयोगों के अलावा स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल प्रदायगी की चुनौतियों को पूरा करने की अपार संभाव्‍यता निहित है।
  • यह उतना ही प्रभावी है जितना एक टेलीफोन के ज़रिये चिकित्‍सा संबंधी किसी समस्‍या पर रोगी और स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ आपस में बात करते हैं।
  • ईसीजी, रेडियोलॉजिकल इमेज आदि जैसे नैदानिक परीक्षणों, चिकित्सीय जानकारी के लिये  इलेक्‍ट्रॉनिक चिकित्‍सा रिकॉर्ड भेजने और आईटी आधारित हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की सहायता से रियल टाइम आधार पर अंत:क्रियात्‍मक चिकित्‍सा वीडियो कॉन्‍फ्रेंस करना, उपग्रह और स्‍थलीय नेटवर्क द्वारा ब्रॉडबैंड के उपयोग से वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग जैसे जटिल कार्य करना भी इसका भाग है। 

टेलीमेडिसिन का इतिहास-

  • पिछले कुछ  वर्षों में टेलीमेडिसिन के द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में दी गई सेवाएँ दूरसंचार प्रौद्योगिकी के अपेक्षाकृत नए उपयोग के रूप में दिखाई देती हैं, सच्चाई यह है कि टेलीमेडिसिन विगत 30  वर्षों से किसी न किसी रूप में उपयोग में है। नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration-NASA) ने टेलीमेडिसिन के शुरुआती विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • टेलीमेडिसिन में NASA के प्रयास 1960 के दशक की शुरुआत में प्रारंभ हुए जब मानव ने अंतरिक्ष में उड़ान भरना शुरू किया। मिशन के दौरान फिजियोलॉजिकल पैरामीटर को अंतरिक्ष यान से प्रेषित किया गया था।  
  • टेलीमेडिसिन का सबसे शुरुआती प्रयोग एरिज़ोना प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रदान करने के लिये किया गया।
  • वर्ष 1971 में नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के द्वारा अलास्का के 26 स्थलों को चुना गया ताकि यह देखा जा सके ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने की दिशा में तकनीकी द्वारा टेलीमेडिसिन का प्रयोग कितना कारगर है।  
  • वर्ष 1989 में नासा ने पहला अंतर्राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन कार्यक्रम प्रारंभ किया जिसके तत्त्वावधान में आर्मेनिया के येरेवन शहर में एक टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किया गया। इसके बाद अमेरिका में चार स्थलों पर टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किये गए, जो कंप्यूटर, इंटरनेट इत्यादि तकनीकी सुविधाओं से लैस थे।

भारत में टेलीमेडिसिन का विकास –

  • भारत में इसरो ने वर्ष 2001 में टेलीमेडिसिन सुविधा पायलट प्रोजेक्ट के साथ प्रारंभ की, जिसने चेन्नई के अपोलो अस्पताल को चित्तूर जिले के अरगोंडा गाँव के अपोलो ग्रामीण अस्पताल से जोड़ा था।
  • इसरो द्वारा की गई पहल में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, विदेश मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ राज्य सरकारों ने भी भारत में टेलीमेडिसिन सेवाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मानकीकृत टेलीमेडिसिन चिकित्सा दिशानिर्देश जारी किये गए और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2005 में एक राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन टास्क फोर्स की स्थापना जैसे सकारात्मक कार्य किये गए।
  • इसरो का टेलीमेडिसिन नेटवर्क एक लंबा सफर तय कर चुका है। इस नेटवर्क में 45 दूरस्थ ग्रामीण अस्पतालों और 15 सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों को जोड़ने का कार्य किया का चुका है। दूरस्थ क्षेत्रों में अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप के विभिन्न द्वीप, जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र, उड़ीसा के मेडिकल कॉलेज और अन्य राज्यों के कुछ ग्रामीण / जिला अस्पताल इस नेटवर्क में शामिल हैं।

टेलीमेडिसिन के क्षेत्र –

  • टेलीहेल्थ- टेलीहेल्थ लंबी दूरी की क्लिनिकल हेल्थकेयर, रोगी और पेशेवर स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षा और प्रशिक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रशासन का समर्थन करने के लिये इलेक्ट्रॉनिक सूचना और दूरसंचार प्रौद्योगिकियों का एक समूह है।
  • टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र– टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र वह स्थल है जहाँ रोगी उपस्थित होता है। एक टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र में, रोगी की चिकित्सा जानकारी को स्कैन / परिवर्तित करने, बदलने और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के साथ साझा करने के लिये उपकरण उपलब्ध होते हैं।
  • टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर- टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर एक स्थल है, जहाँ स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद रहते हैं। वह दूरस्थ स्थल में मौजूद रोगी के साथ बातचीत कर सकता है और उसकी रिपोर्ट देख सकता है तथा उसकी प्रगति की निगरानी कर सकता है।
  • टेलीमेडिसिन प्रणाली- टेलीमेडिसिन प्रणाली हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और संचार चैनल के बीच एक इंटरफेस है जो अंततः सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और दो स्थानों के बीच टेलीकाउंसलिंग को सफल बनाने के लिये दो भौगोलिक स्थानों को जोड़ने का कार्य करता है। हार्डवेयर में एक कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, वीडियो-कांफ्रेंसिंग उपकरण आदि होते हैं। वहीँ सॉफ्टवेयर रोगी की जानकारी (चित्र, रिपोर्ट, फिल्म) आदि को सक्षम बनाता है। संचार चैनल कनेक्टिविटी को सक्षम करता है जिससे दो स्थान एक दूसरे से जुड़ सकते हैं।

टेलीमेडिसिन की उपयोगिता-

  • सुदूर क्षेत्रों तक आसान पहुँच। 
  • परिधीय स्वास्थ्य सेट-अप में टेलीमेडिसिन का उपयोग रोगी परिवहन में लगने वाले समय और लागत को काफी कम कर सकता है।
  • गंभीर देखभाल की निगरानी, जहाँ रोगी को स्थानांतरित करना संभव नहीं है।
  • चिकित्सा शिक्षा और नैदानिक ​​अनुसंधान जारी रखने में सहायता।
  • आपदा के दौरान चिकित्सीय सुविधाओं में किसी प्रकार की रुकावट नहीं।
  • टेलीमेडिसिन प्रौद्योगिकी के उपयोग से सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि दूरसंचार स्थापित होने के बाद यह चिकित्सा पद्धतियों में विशेषज्ञता ला सकता है।
  • रोबोट्स का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य टेलीमेटेड सर्जरी
  • यह महामारी की आशंका में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह स्थानीय और वैश्विक स्तर पर बीमारियों की रियल टाइम निगरानी में एक सक्षम विकल्प है। 

इस क्षेत्र में सरकार के प्रयास

  • संजीवनी- वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने टेलीमेडिसिन से संबंधित एक सॉफ्टवेयर जारी किया जिसे संजीवनी नाम दिया गया। इसे टेलीमेडिसिन के हाइब्रिड मॉडल के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जो ‘स्टोर और फॉरवर्ड’ के साथ-साथ रियल टाइम की अवधारणा का उपयोग करता है।
  • सेहत- वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन के ज़रिये विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अस्पतालों का नेटवर्क संचालित करने वाली कंपनी अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर 60 हजार कॉमन सर्विस सेंटरों (सीएससी-Common Service Centre) में टेलीमेडिसिन सेवा ‘सेहत’ शुरू की है।
  • कॉनटेक- कॉनटेक’ परियोजना दरअसल ‘कोविड-19 नेशनल टेलीकंसल्टेशन सेंटर’ का संक्षिप्त नाम है। यह एक टेलीमेडिसिन केन्द्र है जिसकी स्थापना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान., नई दिल्ली के द्वारा की गई है, जिसमें देश भर से विशेषज्ञों के बहु-आयामी सवालों का उत्तर देने के लिये विभिन्न नैदानिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध होंगे। यह एक बहु-मॉडल दूरसंचार केन्द्र है जिसके माध्यम से देश के अलावा विश्व के किसी भी हिस्से से दोनों ओर से ऑडियो-वीडियो वार्तालाप के साथ-साथ लिखित संपर्क भी किया जा सकता है।

इसके समक्ष चुनौतियाँ –

  • डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी ई-चिकित्सा या टेलीमेडिसिन के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त और परिचित नहीं हैं।
  • टेलीमेडिसिन के परिणामों के बारे में रोगियों में विश्वास की कमी है।
  • भारत में तकनीक और संचार लागत बहुत अधिक है, कभी-कभी यह टेलीमेडिसिन को वित्तीय रूप से अक्षम बना देती है।
  • भारत में, लगभग 40% जनसंख्या गरीबी के स्तर से नीचे रहती है। ऐसे में इस वर्ग का तकनीकी रूप से दक्ष होना अत्यधिक कठिन है।
  • विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर द्वारा समर्थित ई-चिकित्सा को अभी भी परिपक्व होने की आवश्यकता है। सही निदान और डेटा के अन्वेषण के लिये, हमें उन्नत जैविक सेंसर और अधिक बैंडविड्थ समर्थन की आवश्यकता है।
  • टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य सेवा के मामले में दिशानिर्देश बनाने व इन दिशानिर्देशों का उचित अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिये शासी निकाय का अभाव है।

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कोविड-19 के लिए नवीन “कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी / New Convalescent plasma therapy for COVID-19

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक राष्ट्रीय महत्व के संस्थान श्री चित्र तिरुनल इंस्टीच्यूट फार मेडिकल साईंसेज एंड टेक्नोलाजी (एससीटीआईएमएसटी) ने कोविड-19 रोग से ग्रसित मरीजों को नवोन्मेषी उपचार प्रदान करने के लिए एक निर्भीक कदम उठाने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। तकनीकी रूप से ‘ कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी‘ (convalescent-plasma therapy) कहे जाने वाले इस उपचार का उद्वेश्य किसी बीमार व्यक्ति के उपचार के लिए ठीक हो चुके व्यक्ति द्वारा हासिल प्रतिरक्षी शक्ति का उपयोग करना है।

भारत के शीर्ष प्राधिकारी निकाय भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने एससीटीआईएमएसटी को यह नवीन उपचार करने के लिए मंजूरी दे दी है। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘ हमने ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया (डीसीजीआई) को रक्तदान के नियमों में ढील की अनुमति के लिए एज कटआफ हेतु आवेदन किया है।

क्या है कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी : जब एक पैथोजेन की तरह का नोवेल कोरोना वायरस संक्रमित करता है तो हमारी प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का उत्पादन करती है। पुलिस के कुत्तों की तरह एंटीबाडीज आक्रमणकारी वायरस की पहचान करते हैं और चिन्हित करते हैं। श्वेत रक्त कोशिकाएं पहचाने गए घुसपैठियों को संलगन करती हैं और शरीर संक्रमण से मुक्त हो जाता है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन की तरह ही यह थेरेपी ठीक हो चुके व्यक्ति से एंटीबाडी को एकत्रित करती है और बीमार व्यक्ति में समावेशित कर देती है।

 एंटीबाडीज क्या होते हैं?: एंटीबाडीज किसी माइक्रोब द्वारा किसी संक्रमण की अग्रिम पंक्ति प्रतिरक्षी अनुक्रिया होते हैं। वे नोवेल कोरोना वायरस जैसे किसी आक्रमणकारी का सामना करते समय बी लिम्फोसाइट्स नामक प्रतिरक्षी कोशिकाओं द्वारा स्रावित विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं। प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज की रूपरेखा तैयार करते हैं जो प्रत्येक आक्रमणकारी पैथोजेन के प्रति काफी विशिष्ट होते हैं। एक विशिष्ट एंटीबाडी और इसका साझीदार वायरस एक दूसरे के लिए बने होते हैं।

यह उपचार किस प्रकार दिया जाता है?: जो व्यक्ति कोविड-19 की बीमारी से ठीक हो चुका है, उससे खून निकाला जाता है। वायरस को बेअसर करने वाले एंटीबाडीज के लिए सीरम को अलग किया जाता है और जांचा जाता है। कन्वलसेंट सीरम, जोकि किसी संक्रामक रोग से ठीक हो चुके व्यक्ति से प्राप्त ब्लड सीरम है और विशेष रूप से उस पैथोजेन के लिए एंटीबाडीज में समृद्ध है, को तब कोविड-19 के रोगी को दिया जाता है। रोगी निष्क्रिय प्रतिरक्षण प्राप्त कर लेता है। डा. किशोर ने इंडिया साईंस वायर से बातचीत करते हुए बताया कि ,‘ ब्लड सीरम निकालने और रोगी को दिए जाने से पहले संभावित डोनर की जांच की जाती है। पहली बात यह कि स्वाब टेस्ट निगेटिव होनी चाहिए और संभावित डोनर को स्वस्थ घोषित होना चाहिए। इसके बाद ठीक हो चुके व्यक्ति को दो सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए। या फिर संभावित डोनर को कम से कम 28 दिनों तक अलक्षणी होना चाहिए। इनमें से दोनों ही अनिवार्य हैं। ‘

कौन यह उपचार प्राप्त करेगा?: डा. किशोर ने बताया कि, ‘ आरंभ में हम कुछ ही रोगियों पर इसका प्रयास करेंगे। वर्तमान में इसकी अनुमति केवल बुरी तरह से संक्रमित रोगियों के लिए सीमित उपयोग हेतु एक प्रायोगिक थेरेपी के रूप में दी गई है। ‘

यह टीकाकरण से अलग कैसे है? यह  थेरेपी निष्क्रिय टीकाकरण के समान है। जब कोई टीका दिया जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का निर्माण करती है। इस प्रकार, बाद में जब टीका प्राप्त कर चुका व्यक्ति उस पैथोजेन से संक्रमित हो जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज स्रावित करती है और संक्रमण को निष्प्रभावी बना देती है। टीकाकरण जीवन पर्यंत प्रतिरक्षण देता है। निष्क्रिय एंटीबाडी थेरेपी के मामले में, इसका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक इंजेक्ट किए गए एंटीबाडीज खून की धारा में रहते हैं। दी गई सुरक्षा अस्थायी होती है। इससे पहले कि कोई शिशु अपना खुद का प्रतिरक्षण तैयार करे, माता अपने दूध के जरिये एंटीबाडीज अंतरित करती है।

इतिहास: 1890 में, जर्मनी के फिजियोलाजिस्ट इमिल वान बेहरिंग ने खोज की थी कि डिपथिरिया से संक्रमित एक खरगोश से प्राप्त सीरम डिपथिरिया संक्रमण को रोकने में प्रभावी है। बेहरिंग को 1901 में दवा के लिए सर्वप्रथम नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस समय एंटीबाडीज ज्ञात नहीं था। कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी कम प्रभावी था और इसके काफी साइड इफेक्ट थे। एंटीबाडीज फ्रैक्शन को अलग करने में कई वर्ष लगे। फिर भी अलक्षित एंटीबाडीज और अशुद्धियों के कारण साइड इफेक्ट होते रहे।

क्या यह प्रभावी है ? हमारे पास बैक्टिरियल संक्रमण के खिलाफ काफी एंटीबायोटिक्स हैं। तथापि, हमारे पास प्रभावी एंटीवायरल्स नहीं हैं। जब कभी कोई नया वायरल प्रकोप होता है तो इसके उपचार के लिए कोई दवा नहीं होती। इसलिए, कन्वलसेंट सीरम का उपयोग पिछले वायरल महामारियों के दौरान किया गया है। 2009-10 के एच1एन1 इंफ्लुएंजा वायरस महामारी के प्रकोप के दौरान इंटेसिंव केयर की आवश्यकता वाले संक्रमित रोगियों का उपयोग किया गया। निष्क्रिय एंटीबाडी उपचार के बाद, सीरम उपचारित रोगियों ने नैदानिक सुधार प्रदर्शित किया। वायरल को बोझ कम हुआ और मृत्यु दर में कमी किया जा सका। यह प्रक्रिया 2018 में इबोला प्रकोप के दौरान भी उपयोगी रही।

 क्या यह सुरक्षित है ? आधुनिक ब्लड बैंकिंग तकनीक जो रक्त जनित पैथोजीन की जांच करते हैं, मजबूत है। डोनर एवं प्राप्तकर्ता के खून के प्रकारों को मैच करना मुश्किल नहीं है। इसलिए, अनजाने में ज्ञात संक्रमित एजेंटों को ट्रांसफर करने या ट्रांसफ्यूजन रियेक्शन पैदा होने के जोखिम कम हैं। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘जैसाकि हम रक्तदान के मामलों में करते हैं, हमें ब्लड ग्रुप एवं आरएच अनुकूलता का ध्यान रखना होता है। केवल वही लोग जिनका ब्लड ग्रुप मैच करता है, खून दे या ले सकते हैं। खून देने की अनुमति दिए जाने से पूर्व डोनर की सख्ती से जांच की जाएगी तथा कुछ विशेष अनिवार्य कारकों का परीक्षण किया जाएगा। उनकी हेपाटाइटिस, एचआईवी, मलेरिया आदि की जांच की जाएगी जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे रिसीवर को अलग पैथोजेन न हस्तांतरित कर दे। ‘

एंटीबाडीज प्राप्तकर्ता में कितने समय तक बना रहेगा ? जब एंटीबाडी सीरम दिया जाता है तो तो यह प्राप्तकर्ता में कम से कम तीन से चार दिनों तक बना रहेगा। इस अवधि के दौरान बीमार व्यक्ति ठीक हो जाएगा। अमेरिका एवं चीन की अनुसंधान रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि ट्रांसफ्यूजन प्लाज्मा के लाभदायक प्रभाव पहले तीन से चार दिनों में प्राप्त होते हैं, बाद में नहीं।

चुनौतियां: मुख्य रूप से जीवित बचे लोगों से प्लाज्मा की उल्लेखनीय मात्रा प्राप्त करने में कठिनाई के कारण यह थेरेपी उपयोग में लाये जाने के लिए सरल नहीं है। कोविड-19 जैसी बीमारियों में, जहां अधिकांश पीड़ित उम्रदराज हैं और हाइपरटेंशन, डायबिटीज और ऐसे अन्य रोगों से ग्रसित हैं, ठीक हो चुके सभी व्यक्ति स्वेच्छा से रक्त दान करने के लिए तैयार नहीं होंगे।

स्रोत-PIB

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शोध: भारत में कोरोना के कम मामलों के पीछे बीसीजी के टीका का योगदान

  • दूसरे देशों की तुलना में भारत में कोरोना के कम मामले होने के पीछे क्या बीसीजी का टीका जिम्मेदार है। भले ही इसका कोई और कारण हो लेकिन अमेरिकी शोधकर्ता मान रहे हैं कि इसके पीछे बीसीजी टीके की अहम भूमिका है। अगर यह बात सिद्ध हो जाती है तो यह टीका कोरोना से लड़ाई में गेम चेंजर साबित हो सकता है। कोरोना का प्रकोप फैलने पर अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों को आशंका थी कि विशाल आबादी वाले भारत में बड़े पैमाने पर मौतें होंगी। लेकिन अभी तक जो पैटर्न है इससे उनकी आशंका गलत साबित हो गई है।

बीसीजी हो सकता है कारगर

  • अमेरिकी वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में नवजात बच्चों को बैसिलस कैलमेट गुयरिन (बीसीजी) टीका देने की जो परंपरा है उसके कारण कोरोना का इतना प्रभाव नहीं हो रहा है। जबकि इटली, नीदरलैंड्स और अमेरिका जहां बच्चों को यह टीका नहीं दिया जाता वहां संक्रमितों व मरने वालों की संख्या बेतहाशा बढ़ती जा रही है। न्यूयार्क इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी बायोकेमिकल साइंसेज के असिस्टेंट प्रोफेसर गोंजालो ओताजू ने कहा कि इस संबंध में किये गये अध्ययन में हमने पाया कि कोविड-19 से निपटने में बीसीजी कारगर हो सकता है। इस अध्ययन की रिपोर्ट अभी प्रकाशित होनी है।

1948 में शुरू हुआ था टीके का चलन

  • अध्ययन के मुताबिक बीसीजी भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मवेशियों में टीबी रोग के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया माइकोबक्टीरियम बोविस के कमजोर स्वरूप से तैयार किया जाता है। यह मनुष्यों में टीबी के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया से भिन्न होता है। भारत में बीसीजी टीके का चलन 1948 में शुरू हुआ था। तब भारत में टीबी (ट्यूबर कोलोसिस) के मामले दुनिया में सबसे ज्यादा होते थे। इस संबंध में भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि हम लोग इस बात से आशांवित हैं लेकिन अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा।

सार्स में प्रभावी साबित हुई बीसीजी वैक्सीन

  • लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब के एप्लाइड मेडिकल साइंसेज फैकल्टी की सीनियर डीन मोनिका गुलाटी ने बताया कि ऐसे मौकों पर छोटी सी बात भी उम्मीद बंधाती है। खास बात यह है कि सार्स के संक्रमण में बीसीजी वैक्सीन प्रभावी साबित हुई है। सार्स का वायरस भी मूलत: कोरोना परिवार का वायरस है। अमेरिका में कोरोना के अब तकक़रीब ३ लाख से अधिक मामले सामने आ चुके हैं जबकि 4000 से अधिक की मौत हो चुकी है। जबकि इटली में105,000 सामने आये हैं और 12 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। इसी तरह नीदरलैंड्स में 12,000 से अधिक मामले आने के साथ एक हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं।

बीसीजी के टीके की खोज –

  • बीसीजी वैक्सीन को माईकोबैक्टीरियम बोविस के सबसे कमजोर बैक्टीरिया से तैयार किया जाता है। यह बैक्टीरिया टीबी के मुख्य कारण माने जाने वाले बैक्टीरिया एम. ट्यूबरकुलोसिस से संबंधित होता है। यह दवा 13 सालों (1908 से 1921 तक) में तैयार की गई थी। इसको फ्रांस के बैक्टीरियोलोजिस्ट एडबर्ट कैलमिटी व कैमिली ग्युरिन ने तैयार किया था। इन दोनों ही बैक्टीरियोलोजिस्ट के नाम के कारण इस वैक्सीन को बेसिल कालमेट ग्युरिन (Bacillus calmette-guerin) नाम दिया गया। यह टीका टीबी के उच्च जोखिम वाले शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद दिया जाता है। बीसीजी वैक्सीन टीबी से बचाव के लिए शिशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता को तैयार करती है।
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Arogya Setu App/ आरोग्य सेतु एप

कोरोना के संक्रमण से बचाने में मदद करेगा सरकारी एप ‘आरोग्य सेतु’

  • सरकार ने एक मोबाइल एप लॉन्च किया है. इस एप नाम ‘आरोग्य सेतु’ (Arogya Setu app) है. इस एप की मदद से लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे और जोखिम का आकलन करने में मदद मिल सकेगी. यह एप लोगों को वायरस से संक्रमित व्यक्ति के नजदीक जाने पर सतर्क करेगा.
  • एप केवल ताजा मामलों का पता लगाएगा और केवल उन्हीं लोगों को सतर्क करेगा जो संक्रमित व्यक्ति के आस-पास रहे हैं. एक ‘ यह एप आवाज के जरिये इस्तेमाल में आने वाली तकनीक से संकमितों का पता लगाने में मदद करेगा. इसमें अति आधुनिक ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग शामिल है. यह एप 11 भाषाओं में उपलब्ध है. इसे एंड्रियोड और ioS दोनों प्लेटफार्म पर लॉन्च किया गया है.
  • यदि कोई व्यक्ति चिकित्सा परीक्षण के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित पाया जाता है तो संक्रमित व्यक्ति का मोबाइल नंबर स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बनाए गए रजिस्टर में शामिल होगा और एप पर भी इस सूचना को अपडेट किया जा जायेगा
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कोरोना टेस्ट किट/ Testing kit-Covid-19-By-CSIR-INDIA

कोविड-19 के परीक्षण के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित की पेपर-स्ट्रिप किट

इसके विकसित होने के बाद बड़े पैमाने पर कोरोना के परीक्षण चुनौती से निपटने में मदद मिल सकती है

इस पेपर-किट में जीन-संपादन की अत्याधुनिक तकनीक क्रिस्पर-कैस-9 का उपयोग किया गया है

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे –“ इस किट के विकास से जुड़े प्राथमिक परिणाम उत्साहजनक हैं”

“नियामक निकायों से इसके उपयोग की अनुमति जल्दी ही मिल सकती है, जिसके बाद इस किट का उपयोग परीक्षण के लिए किया जा सकता है”

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के वैज्ञानिकों को कोविड-19 के त्वरित परीक्षण के लिए एक नई किट विकसित में बड़ी सफलता मिली है। सीएसआईआर से संबद्ध नई दिल्ली स्थित जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान (आईजीआईबी) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह एक पेपर-स्ट्रिप आधारित परीक्षण किट है, जिसकी मदद से कम समय में कोविड-19 के संक्रमण का पता लगाया जा सकता है।

यह पेपर स्ट्रिप-आधारित परीक्षण किट आईजीआईबी के वैज्ञानिक डॉ सौविक मैती और डॉ देबज्योति चक्रवर्ती की अगुवाई वाली एक टीम ने विकसित की है। यह किट एक घंटे से भी कम समय में नये कोरोना वायरस (एसएआरएस-सीओवी-2) के वायरल आरएनए का पता लगा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आमतौर पर प्रचलित परीक्षण विधियों के मुकाबले यह एक पेपर-स्ट्रिप किट काफी सस्ती है और इसके विकसित होने के बाद बड़े पैमाने पर कोरोना के परीक्षण चुनौती से निपटने में मदद मिल सकती है।

आईजीआईबी के वैज्ञानिक डॉ देबज्योति चक्रवर्ती ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “संक्रमण के शिकार संदिग्ध व्यक्तियों में कोरोना वायरस के जीनोमिक अनुक्रम की पहचान करने के लिए इस पेपर-किट में जीन-संपादन की अत्याधुनिक तकनीक क्रिस्पर-कैस-9 का उपयोग किया गया है।” इस किट की एक खासियत यह है कि इसका उपयोग तेजी से फैल रही कोविड-19 महामारी का पता लगाने के लिए व्यापक स्तर पर किया जा सकेगा। 

डॉ देबज्योति चक्रवर्ती ने कहा, “अभी इस परीक्षण किट की वैद्यता का परीक्षण किया जा रहा है, जिसके पूरा होने के बाद इसका उपयोग नये कोरोना वायरस के परीक्षण के लिए किया जा सकेगा। इस किट के आने से वायरस के परीक्षण के लिए वर्तमान में इस्तेमाल की जाने वाली महँगी रियल टाइम पीसीआर मशीनों की जरूरत नहीं पड़ेगी। नई किट के उपयोग से परीक्षण की लागत करीब 500 रुपये आती है।”

आईजीआईबी के वैज्ञानिकों ने बताया कि वे इस टूल पर लगभग दो साल से काम कर रहे हैं। लेकिन, जनवरी के अंत में, जब चीन में कोरोना का प्रकोप चरम पर था, तो उन्होंने यह देखने के लिए परीक्षण शुरू किया कि यह किट कोविड-19 का पता लगाने में कितनी कारगर हो सकती है। इस कवायद में किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए आईजीआईबी के वैज्ञानिक पिछले करीब दो महीनों से दिन-रात जुटे हुए थे।

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे ने कहा है – “ इस किट के विकास से जुड़े प्राथमिक परिणाम उत्साहजनक हैं। हालाँकि, प्राथमिक नतीजे अभी सीमित नमूनों पर देखे गए हैं और इसका परीक्षण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। दूसरे देशों से मंगाए गए नमूनों पर भी इसका परीक्षण किया जाएगा। नियामक निकायों से इसके उपयोग की अनुमति जल्दी ही मिल सकती है, जिसके बाद इस किट का उपयोग परीक्षण के लिए किया जा सकता है।”

Source– Press Information bureau(PIB)

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Hantavirus- Is it a New Global Pandemic?/ हंता वाइरस- क्या यह एक नई वैश्विक महामारी है?

By Rodents

विश्व के लगभग 200 देश अभी Corona वाइरस के प्रभाव से बाहर भी नही निकले कि चीन से ख़बर आती है कि 24 मार्च को चीन में एक व्यक्ति की हंता वाइरस से मृत्यु हो गई । इस ख़बर को भारतीय मीडिया में इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो यह Corona की ही तरह दुनिया को प्रभावित करने वाला है।

हंता वाइरस को तकनीकी भाषा में इसे Orthohantavirus के नाम से भी जाना जाता है।

इस वाइरस का नाम दक्षिण कोरिया की हंतान नदी के नाम पर रखा गया था

यह वाइरस मुख्यतः मूषक/ चूहों(Rodents) के माध्यम से फैलता है ।यह चूहों के मल, मूत्र एवम् लार के सम्पर्क में आने से फैलता है।

सामान्यतः घर , फ़ैक्ट्री आदि की सफाई के दौरान इसके फैलने की सम्भावना अधिक रहती है यदि उन जगहों पर चूहों का वास रहा हो।

हंता वाइरस के लक्षण( Symptoms )— इस वाइरस के लक्षण 1 से 8 सप्ताह में सामने आते है।

आरम्भ में थकान, बुख़ार, मांसपेशियों में दर्द, सिर दर्द, सर्दी, उल्टी आदि जैसे लक्षण दिखाई देते है

कुछ समय बाद क़फ़ युक्त खांसी व साँस लेने में तकलीफ़ होती है कभी कभी रोगी की किडनी भी फैल हो जाती है।

USA के रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार इस वाइरस से प्रभावित लोगों में मृत्यु दर 40% तक है। सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक वर्ष लगभग 1.5 लाख लोग इससे प्रभावित होते है जिनमें से अधिकांश चीन से होते है।

इस वाइरस प्रभाव की पहचान करना अत्यधिक जटिल है क्योंकि आरम्भिक लक्षण सामान्य फ़्लू के जैसे होते है।यदि रोगी को साँस लेने में तकलीफ़ हो तो हंता वाइरस हो सकता है।

अभी तक इसकी वैक्सीन तैयार नही हो सकी है। यदि समय पर पहचान हो रोगी को बचाया जा सकता है। 40% मृत्यु दर उन मामलों में है जब रोगी आठ से दस सप्ताह बाद उपचार हेतु आता है।

इसे फैलने से कैसे रोका जाए?—

• Rodents के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क से बचना।

• यदि Rodents का प्रभाव है तो तो उनके मल-मूत्र की सही तरीक़े से सफाई हो।

• जँहा से Rodents के घुसने की सम्भावना हो उन मार्गों को बंद करना।

• खाना व पानी का सही भंडारण करना व कचरे का सही प्रबंध करना

• घरों व कार्यस्थल पर उन सभी वस्तुओं को हटाना जँहा मूषक/ चूहे अपना घर बनाते है।

Hantavirus

क्या इससे Panic होना चाहिये?— इसका उत्तर होगा नही क्योंकि-

॰ विशेषज्ञों का मानना है यह Covid-19 की तरह अनजाना वाइरस नही है

॰ यह एक संक्रामक रोग नही

॰ यह Covid-19 की तरह मानव से मानव में नही फैलता, यह केवल Rodents के मल मूत्र तथा लार के सम्पर्क से फैलता है।

॰ यह सही है कि इसकी वैक्सीन नही है पर डॉक्टर इसके उपचार का तरीक़ा जानते है।

आगे क्या?-

अभी हंता वाइरस के स्थान पर Covid-19 पर ध्यान देना चाहिए । लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि यदि हंता वाइरस महामारी बनता है तो हम कैसे निपटेंगे।