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भारत के द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नियमो में संशोधन/ Amendment in FDI rules by India-

भारत ने हाल ही में अपनी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नीति को संशोधित किया है, जो COVID-19 के प्रकोप से प्रेरित लॉकडाउन द्वारा प्रभावित फर्मों के “अवसरवादी अधिग्रहण” को रोकने के उद्देश्य को धारित करता है ।

FDI क्या है?-

  • एक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) एक देश में किसी अन्य देश में स्थित इकाई द्वारा किसी व्यवसाय में नियंत्रित स्वामित्व के रूप में एक निवेश है। इस प्रकार यह प्रत्यक्ष नियंत्रण की धारणा के आधार पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से अलग है।
  • निवेश की उत्पत्ति परिभाषा को प्रभावित नहीं करती है, एक एफडीआई के रूप में: निवेश को लक्ष्य देश में एक कंपनी खरीदकर या “संगठित रूप से” उस देश में मौजूदा व्यवसाय के संचालन का विस्तार करके किया जा सकता है।
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत 1991 में विदेशी निवेश शुरू किया गया था
  • 2015 में, भारत चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष एफडीआई गंतव्य के रूप में उभरा। भारत ने क्रमशः चीन के 28 बिलियन डॉलरऔर अमेरिका के 27 बिलियन डॉलर की तुलना में $ 31 बिलियन का एफडीआई आकर्षित किया।

FDI के मार्ग

  • क्षेत्रों के अंतर्गत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति या तो स्वचालित मार्ग या सरकारी मार्ग से होती है।
  • स्वचालित मार्ग के तहत, अनिवासी या भारतीय कंपनी को भारत सरकार से किसी भी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
  • जबकि, सरकारी मार्ग के तहत, निवेश से पहले जीओआई के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। सरकारी मार्ग के तहत विदेशी निवेश के प्रस्तावों पर संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय / विभाग द्वारा विचार किया जाता है

भारत सरकार द्वारा नवीन संशोधन-

  • सरकार ने कहा कि पड़ोसी देशों में भारतीय कंपनियों में निवेश करने की इच्छुक फर्मों को पहले इसकी मंजूरी की आवश्यकता होगी। किसी ऐसे देश की एक इकाई जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करती है, अब यहां “केवल सरकारी मार्ग के तहत” फर्मों में निवेश कर सकती है।
  • यह “लाभकारी” मालिकों पर भी लागू होता है – भले ही निवेश कंपनी पड़ोसी देश में स्थित नहीं है, फिर भी यह इन शर्तों के अधीन होगा यदि इसका मालिक एक नागरिक या ऐसे देश का निवासी है।
  • जबकि नोट में किसी भी देश का नाम नहीं था, विश्लेषकों ने संशोधन को संभावित चीनी निवेश पर रोक के उद्देश्य से देखा।
  • यह फैसला चीन के केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBoC) द्वारा HDFC में अपनी हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से अधिक करने के कुछ दिनों बाद हुआ। PBoC मार्च 2019 तक HDFC में 0.8% का मालिकाना शेयरधारक था।
  • चीन का एफडीआई निवेश भारत में 2014 के बाद से पांच गुना बढ़ गया है और दिसंबर 2019 तक, भारत में इसका संचयी निवेश $ 8 बिलियन से अधिक हो गया है – चीनी सरकार के अनुसार, भारत के साथ सीमा साझा करने वाले अन्य देशों के निवेश की तुलना में चीन “कहीं अधिक” भारत में $ 26 बिलियन से अधिक के कुल वर्तमान और नियोजित चीनी निवेश को दर्शाता है

भारत सरकार के तर्क:-

  • भारत का कहना है कि नीति किसी एक देश के उद्देश्य से नहीं है और यह कदम भारतीय फर्मों के “अवसरवादी” अधिग्रहण को रोकने के उद्देश्य से है, जिनमें से कई लॉक डाउन के कारण तनाव में हैं।
  • “संशोधन निवेश पर रोक नहीं लगा रहे हैं। भारत ने इन निवेशों के लिए अनुमोदन मार्ग को ही बदल दिया। भारत में कई क्षेत्र ऐसे हैं जो पहले से ही इस अनुमोदन मार्ग के अधीन हैं, कई अन्य देश इस तरह के उपाय कर रहे थे।

इन संशोधन पर चीन की प्रतिक्रिया: –

  • चीन ने भारत से इन “भेदभावपूर्ण प्रथाओं” को संशोधित करने और विभिन्न देशों से समान रूप से निवेश नियमो का आह्वान किया है। “विशिष्ट देशों के निवेशकों के लिए भारतीय पक्ष द्वारा निर्धारित अतिरिक्त बाधाएं डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) के गैर-भेदभाव के सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं, और व्यापार और निवेश की उदारीकरण और सुविधा की सामान्य प्रवृत्ति के विरुद्ध जाती हैं।
  • चीन के अनुसार अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण, पारदर्शी, पूर्वानुमानित और स्थिर व्यापार और निवेश वातावरण का एहसास करने के लिए और हमारे बाजारों को खुला रखने के लिए जी 20 नेताओं और व्यापार मंत्रियों की आम सहमति के अनुरूप नहीं है।

नवीन संशोधन पर विशेषज्ञों के विचार: –

  • कुछ विशेषज्ञो के अनुसार संशोधन केवल सीमावर्ती देशों पर लागू होते हैं। “अब, निवेश के एक ही सेट के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, जिसके आधार पर कंपनी किस देश से निवेश कर रही है।
  • यह वह जगह है जहां भेदभाव का संभावित मुद्दा प्रखर होता है , हालांकि भारत घरेलू निवेश के पक्ष में भेदभाव कर सकता है, लेकिन गैर-सुरक्षा कारणों से कुछ देशों के खिलाफ भेदभाव वैश्विक स्तर पर अनुकूल नहीं देखा जा सकता है।”तथा यह भारत की व्यापार सुगमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
  • विशेषज्ञ ने कहा कि यदि व्यापार से संबंधित सेवाओं में सामान्य समझौते के तहत गैर-भेदभावपूर्ण दायित्वों का एक संभावित उल्लंघन हो सकता है, । “अधिकांश अन्य देशों ने जो अपने निवेश नियमों को कड़ा कर दिया है, उन्होंने सर्वसम्मति से किया है, जिसका अर्थ है कि यह सभी देशों पर लागू होगा।”
  • यह कदम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में फेसबुक ने रिलायंस जियो में कुछ हिस्सेदारी हासिल की है।

इस मुद्दे पर वैश्विक स्थिति : –

  • भारत से पहले, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया ने इसी तरह के उपायों की शुरुआत की थी। ये, फिर से, चीनी निवेश पर लक्षित होने के रूप में देखे गए।
  • 25 मार्च को, यूरोपीय आयोग ने ऐसे समय में विदेशी निवेश स्क्रीनिंग के लिए “एक मजबूत यूरोपीय संघ-व्यापक दृष्टिकोण” सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। इसका उद्देश्य यूरोपीय संघ के विदेशी निवेश को सामान्य रूप से कम किए बिना यूरोपीय संघ की कंपनियों और महत्वपूर्ण संपत्तियों को संरक्षित करना था, विशेष रूप से स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में जो सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थे, ।
  • ऑस्ट्रेलिया ने अस्थायी रूप से विदेशी अधिग्रहणों पर नियमों को कड़ा कर दिया है, इस चिंता से कि रणनीतिक संपत्ति सस्ते में बेची जा सकती है। इसके बाद चेतावनी दी गई कि विमानन, माल और स्वास्थ्य क्षेत्रों में परेशान ऑस्ट्रेलियाई कंपनियां राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों, विशेष रूप से चीन द्वारा खरीद के लिए असुरक्षित हो सकती हैं। सभी विदेशी अधिग्रहण और निवेश प्रस्तावों की अब ऑस्ट्रेलिया के विदेशी निवेश समीक्षा बोर्ड द्वारा जांच की जाएगी।
  • स्पेन, इटली और अमेरिका ने भी निवेश से संबंधित प्रतिबंध लागू किए हैं,

भारत सरकार के पिछले प्रयास : –

  • कुछ देशों के लिए अतिरिक्त आवश्यकताओं को लागू करने का कदम अभूतपूर्व है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक, भारत ने कुछ क्षेत्रों में निवेश पर इस तरह के उपाय किए हैं।
  • उदाहरण के लिए, जबकि 2011 तक स्वचालित मार्ग के तहत फार्मास्यूटिकल्स में एफडीआई की अनुमति दी गई थी, सरकार ने इस क्षेत्र में आने वाले किसी भी निवेश के लिए अनुमोदन अनिवार्य कर दिया था।
  • “ऐसा कुछ विदेशी कंपनियों द्वारा भारत के फार्मास्युटिकल उद्योग में निवेश बढ़ाने के इरादे से इन संस्थाओं को संभावित रूप से संभालने के इरादे से अलर्ट किए जाने के बाद हुआ था। यह निर्णय राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया था। 2014 में नई सरकार के निर्वाचित होने के बाद, नीति को उदार बनाया गया था, लेकिन अब भी स्वत: निवेश के तहत केवल 74 प्रतिशत तक निवेश की अनुमति है, “
  • 2010 में, सरकार ने जापान तम्बाकू की हालिया घोषणाओं के बाद सिगरेट निर्माण में एफडीआई पर प्रतिबंध लगा दिया कि वह अपनी भारतीय सहायक कंपनी में हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर देगी। अतीत में, भारत ने चीन के साथ द्विपक्षीय गतिरोध के दौरान कुछ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भी रोक दिया है,
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कच्चे तेल की क़ीमत में गिरावट- कारण और प्रभाव/ Crude oil price drop – Causes and Effects-

कच्चे तेल का अमेरिकी सूचकांक वेस्ट टैक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) के सोमवार को शून्य से नीचे 37 डॉलर प्रति बैरल तक फिसलने के बाद दुनिया के तेल एवं वित्तीय बाजारों में गिरावट देखने को मिल रही है।

कीमतों में गिरावट के मुख्य कारण:-

  • कच्चे तेल के वायदा कारोबार में कीमतों में गिरावट आई है। वायदा कारोबार में खरीदार एक खास समय में निर्धारित कीमत पर कच्चा तेल वायदा खरीदने के लिए सौदा करता है। गिरावट की मुख्य वजह ताजा डिलिवरी लेने और भंडारण लागत से बचने के लिए कारोबारियों द्वारा अपना माल घटाए जाने की कोशिश करना था। डब्ल्यूटीआई कीमतें 0.10 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई थीं, जो गिरावट से मामूली सुधार था।
  • अमेरिकी तेल के लिए बेंचमार्क कीमत कोविड-19 महामारी के प्रसार से पहले 50 डॉलर प्रति बैरल थी और मौजूदा कमजोरी वैश्विक मांग में एक-तिहाई की गिरावट की वजह से आई है। अमेरिका में लॉकडाउन के बाद लोगों द्वारा ईंधन का कम इस्तेमाल किए जाने से मांग में कमजोरी को बढ़ावा मिला है।
  • ओपेक, रूस, अमेरिका और जी-20 देशों समेत तेल उत्पादकों द्वारा वैश्विक उत्पादन प्रति दिन 1 करोड़ बैरल तक घटाने को लेकर सहमति जताई गई है। हालांकि मौजूदा कमजोर कीमतों से संकेत मिलता है कि यह प्रयास मौजूदा चिंताओं को दूर करने के उपायों के अंतर्गत कम प्रभावी है क्योंकि मांग में हर दिन 3 करोड़ बैरल तक की कमी आई है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि दुनिया में जरूरत की तुलना में ज्यादा तेल उपलब्ध है, अथवा लोग लॉक डाउन इत्यादि कारणों से तेल का कम प्रयोग कर रहे हैं।

कीमतों में उतार-चढ़ाव के सामान्य कारण-

  • तेल की कीमतें विभिन्न कारकों से प्रभावित होती हैं, लेकिन विशेष रूप से पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा किए गए उत्पादन के बारे में निर्णयों के प्रति उत्तरदायी हैं।
  • किसी भी उत्पाद की तरह, आपूर्ति और मांग के कानून कीमतों को प्रभावित करते हैं; स्थिर मांग और ओवर सप्लाई के संयोजन ने पिछले पांच वर्षों में तेल की कीमतों पर दबाव डाला है।
  • प्राकृतिक आपदाएं जो संभावित रूप से उत्पादन को बाधित कर सकती हैं, और मध्य पूर्व जैसे तेल-उत्पादक क्षेत्रों में राजनीतिक अशांति भी मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती हैं।
  • उत्पादन लागत भंडारण की क्षमता के साथ-साथ कीमतों को प्रभावित करती है; हालांकि कम प्रभावशाली, ब्याज दरों की दिशा वस्तुओं की कीमत को भी प्रभावित कर सकती है।

कोरोनोवायरस का प्रभाव :-

  • कोरोनावायरस ने दुनिया भर में ऊर्जा की मांग को कम कर दिया है, लेकिन विशेष रूप से चीन में, जो सबसे बड़ा आयातक है।
  • विश्व के सभी देशो में कारखानों को निष्क्रिय कर दिया गया है और चीन के वुहान में शुरू होने वाले कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण दुनिया भर में हजारों उड़ानें रद्द हो गई हैं, ।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने सोमवार को कहा कि उसे उम्मीद है कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद 2009 में मंदी के बाद पहली बार इस साल संकट प्रभावी होगा

किन देशों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा?

  • रूस कम कीमतों के लिए सबसे अधिक अछूता होने का दावा करता है क्योंकि इसका वार्षिक बजट लगभग $ 40 प्रति बैरल की औसत कीमत पर आधारित है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने इसे और अधिक कुशल बनने के लिए मजबूर कर दिया है।
  • खाड़ी देशों ने सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में $ 2- $ 6 प्रति बैरल की अनुमानित लागत पर तेल का उत्पादन किया, लेकिन उच्च सरकारी खर्च और नागरिकों के लिए उदार सब्सिडी के कारण,अपने बजट को संतुलित करने के लिए उन्हें 70 डॉलर प्रति बैरल या अधिक की कीमत में विक्री की आवश्यकता है
  • तेल पर निर्भर वे राज्य जो संघर्ष, या प्रतिबंधों के वर्षों से पीड़ित हैं, वे सबसे भारी कीमत का भुगतान करेंगे। इराक, ईरान, लीबिया और वेनेजुएला सभी उस श्रेणी में हैं। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका भी इससे प्रभावित होगा । कुछ राज्यों के लिए शेल ऑयल का उछाल आर्थिक मंदी लेकर आया है और कम कीमतों से तेल कंपनियों को नुकसान होगा।

भारत पर इसका प्रभाव :-

  • जहां तक भारतीय बाजार की बात है तो यह कच्चे तेल को 25 प्रतिशत भारांश देते हुए अपने आयात मानकों का निर्धारण करता है। इसका कच्चा तेल बास्केट इस समय वर्ष 2019-20 के औसत 60.6 डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी 20 डॉलर प्रति बैरल रह गया है।
  • भारतीय कच्चा तेल बास्केट बेंचामार्क 75 प्रतिशत भारांश दुबई-ओमान को देता है। दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती से कच्चे तेल की मांग पहले ही कम हो गई थी, लेकिन कोविड-19 महामारी से हालात और बिगड़ते चले गए।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार वर्ष 2020 में तेल की वैश्विक मांग कम होकर 90 लाख बैरल प्रति दिन रह जाएगी।
  • आईईए के अनुसार इससे एक दशक की वृद्धि दर के बराबर नुकसान होगा। आईईए ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘तेल उद्योग के लिए अप्रैल सबसे खराब महीना साबित हो सकता है। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले तेल की मांग 2.9 करोड़ बैरल तक कम हो सकती है।’
  • भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है और तेल कीमतों में कमी से इसे लाभ भी मिल सकता है, लेकिन भारत में उत्पादों की कीमतों उनके अपने मानक सूचकांकों से जुड़ी होती है।
  • इसके अतिरिक्त डॉलर के मुकाबले रुपये के 76.63 तक फिसलने से तेल कीमतों में कमी से होने वाला लाभ सीमित रह सकता है। इस बीच, भारत विशाखापत्तनम, मंगलूर और पाडुर में 53.3 लाख टन तेल का रणनीतिक भंडार जमा करना चाहता है।
  • कच्चा तेल (ब्रेंट) शेष दुनिया या दुनिया की करीब दो-तिहाई मांग के लिए बेंचमार्क है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार कच्चे तेल में भारतीय भागीदारी देसी रिफाइनरियों में प्रसंस्कृत कच्चे तेल के सोर ग्रेड (ओमान और दुबई एवरेज) और स्वीट ग्रेड (ब्रेंट) के 75.50 : 24.50 अनुपात का प्रतिनिधित्व करती है। डब्ल्यूटीआई कीमतों का लंबी अवधि में ब्रेंट कीमतों पर कुछ असर दिख सकता है।
  • तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए बेहतर होगा क्योंकि भारत की ट्विन डेफिसिट में एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतें हैं।

इसका उपभोक्ताओं पर प्रभाव-

  • चीन, भारत और जर्मनी जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा बिल गिरने से कुछ आवश्यक राहत मिल सकती है।
  • उपभोक्ताओं को कम तेल की कीमतों और पंप पर गैस की कीमतों में गिरावट से सामान्य रूप से लाभ होता है, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में जहां खुदरा बाजार सीधे आपूर्ति और मांग के लिए अधिक प्रतिक्रिया करते हैं। कर और अधिभार यूरोप में पंप की कीमतों का एक उच्च हिस्सा बनाते हैं, इसलिए वहां प्रभाव कम चिह्नित है।
  • लेकिन गैस की कीमतों में किसी भी कमी की संभावना वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण कोरोनोवायरस की वजह से अर्थव्यवस्था को अव्यवस्थित होने से होगी।
  • फिर इस मूल्य युद्ध का प्रभाव टेक्सास, लुइसियाना, ओक्लाहोमा, न्यू मैक्सिको और नॉर्थ डकोटा जैसे राज्यों में अमेरिकी तेल उत्पादकों और ऊर्जा क्षेत्र के रोजगार पर पड़ेगा, जिन्होंने पिछले एक दशक में उछाल का आनंद लिया है।

कीमतों को रोकने के उपाय-

  • तेल की कीमतें थामने के लिए तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और रूस ने मई और जून में उत्पादन में 97 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती करने की घोषणा की थी।
  • कीमतों में गिरावट रोकने के लिए जुलाई और दिसंबर में इसे कम कर 77 लाख बैरल प्रति दिन और अप्रैल 2022 तक 58 लाख बैरल प्रति दिन तक करने की योजना तैयार की गई थी। माना जा रहा है कि 2020 के अंत तक इससे बाजार में कुछ हद तक तेल का भंडार कम हो सकता है।
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NEWS ANALYSIS

World Health Organization financing/ विश्व स्वास्थ्य संगठन का वित्तीयन-

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि वह डब्ल्यूएचओ को अमेरिका द्वारा दी जाने वाली धनराशि को रोक देगा, अमेरिका ने यह आरोप लगाया कि कोरोना के प्रसार को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बेहतर प्रबंधित नहीं किया

WHO के वित्तीयन के सम्बंध में निम्नलिखित व्यवस्था है

  • यह बड़ी संख्या में देशों, परोपकारी संगठनों, संयुक्त राष्ट्र संगठनों आदि द्वारा वित्त पोषित है। डब्ल्यूएचओ द्वारा अपलोड की गई जानकारी के अनुसार, सदस्य राज्यों (जैसे अमेरिका) से स्वैच्छिक दान 35.41% योगदान करते हैं, मूल्यांकन योगदान 15.6%% है, परोपकारी संगठन खाते से 9.33% , संयुक्त राष्ट्र के संगठन लगभग 8.1% का योगदान करते हैं; शेष विभिन्न स्रोतों से आता है।
  • अमेरिका WHO की कुल फंडिंग का लगभग 15% और सदस्य राज्यों के वित्तीयन का लगभग 31% योगदान देता है, दोनों मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा है।
  • भारत सदस्य देशों के दान का 1% योगदान देता है (जो कि कुल WHO फंडिंग का .48% है)।
  • डब्ल्यूएचओ के कुल वित्तीय बजट का 5 प्रतिशत से अधिक योगदान अमेरिका के बाद यूके (7.79 प्रतिशत) और जर्मनी (5.68 प्रतिशत) द्वारा आता है ।
  • मानवीय मामलों के समन्वय के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNOCHA) 5 प्रतिशत से अधिक योगदान देने वाला अन्य निकाय है।
  • विश्व बैंक (3.42 प्रतिशत), रोटरी इंटरनेशनल (3.3 प्रतिशत), यूरोपीय आयोग (3.3 प्रतिशत) और जापान (2.7 प्रतिशत) डब्ल्यूएचओ के वित्त के अन्य प्रमुख योगदानकर्ताओं में से हैं।
  • डब्ल्यूएचओ के लिए, इसके कुल वित्त पोषण का लगभग 15% का नुकसान दुनिया भर में असर पड़ता है। हालाँकि, जब तक अन्य देश अमेरिका के समान कार्य नहीं करेंगे, तब तक इस कदम से डब्ल्यूएचओ के संचालन में गंभीर बाधा नहीं आ सकती है।
  • चीन, जो नॉवल कोरोनोवायरस महामारी के मद्देनजर मौजूदा डब्ल्यूएचओ विवाद के केंद्र में है, वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी में कुल धन का केवल 0.21 प्रतिशत प्रवाहित करता है।
  • वित्त पोषण की अगली बड़ी श्रेणी में जो मूल्यांकन योगदान किया जाता है वह सदस्यता शुल्क की तरह हैं।एक सदस्य के रूप में कोई भी राष्ट्र इस सदस्यता शुल्क से मुक्त नहीं रहा सकता
  • डब्ल्यूएचओ प्रत्येक सदस्य देश के लिए उसके वित्तीय स्वास्थ्य और जनसंख्या के आधार पर निर्धारित शुल्क का आकलन करता है। इसी कारण से, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, यूएस, कुल WHO फंडों में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देती है और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था 0.25 प्रतिशत से कम योगदान करती है ।
  • स्वास्थ फ़्लू महामारी के विश्व में प्रसारित होने के दो साल बाद, 2011 में स्वास्थ्य एजेंसी की कुल धनराशि के 17 प्रतिशत के लिए मूल्यांकन योगदान या डब्ल्यूएचओ सदस्यता शुल्क से आता है।

WHO का व्यय: –

  • विश्व स्वास्थय संगठन विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होता है। उदाहरण के लिए, 2018-19 में, 19.36% (लगभग $ 1 बीएन) पोलियो उन्मूलन पर खर्च किया गया था, आवश्यक स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं की बढ़ती पहुंच पर 8.77%, टीका निवारणीय रोगों पर 7% और प्रकोपों की रोकथाम और नियंत्रण पर लगभग 4.36% खर्च किया गया था।
  • अफ्रीका के देशों को डब्ल्यूएचओ परियोजनाओं के लिए $ 1.6 बिलियन प्राप्त हुआ; और दक्षिण पूर्व एशिया (भारत सहित) ने $ 375 मिलियन प्राप्त किए। भारत WHO दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र का एक सदस्य राज्य है।
  • अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ परियोजनाओं के लिए $ 62.2 मिलियन प्राप्त किए। यह वह क्षेत्र है जहाँ से विश्व स्वास्थय संगठन सर्वाधिक योगदान प्राप्त करता है तथा सबसे कम व्यय करता है

WHO की आलोचना का आधार :-

  • वायरस प्रसार के के प्रारंभिक चरण में जब कई राष्ट्रों द्वारा चीन पर व्यापारिक तथा यात्रा प्रतिबन्ध आरोपित किये गए तब विश्व स्वास्थय संगठन ने इस कदम का विरोध किया।
  • इसके साथ ही साथ अपनी प्रारंभिक वक्तव्यों में विश्व स्वास्थ्य संगठन मानव से मानव प्रसार को भी मान्यता नहीं देता रहा जिसके भयवाह परिणाम देखने को मिल रहे।

USA के इस कदम का वैश्विक प्रभाव :-

  • ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन का वित्तीयन रोका जाना इस प्रकार की प्रथम घटना नहीं है।  इसके पूर्व अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनो का वित्तीयन रोका गया है।  अमेरिका द्वारा इस प्रकार के कदम चीन को वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका  बढ़ाने का अवसर प्रदान कर  रहा है।
  • इस संकट के समय जब लगभग  महत्वपूर्ण देश कोरोना संकट से ग्रस्त है ऐसे में अमेरिका द्वारा वित्तीयन रोकना लगभग आधी आबादी को संकट में डालने वाला कदम है वरन यह अमेरिका का वैश्विक नेतृत्वकर्ता  रूप में क्षवि को भी धूमिल करता है
  • अमेरिका का यह कदम प्रखर संरक्षणवादी नीति का सूचक है तथा यदि इसका अनुशरण ब्रिटेन तथा जर्मनी जैसे देशो ने किया तो यह कोरोना के विरुद्ध वैश्विक प्रयास को  बड़ा आघात लगेगा ।
  • इसके पूर्व करोनाबोन्ड के मुद्दे पर जर्मनी के नेतृत्व में कई यूरोपियन देश सामूहिक उत्तरदायित्व का विरोध कर रहे हैं ऐसे में अमेरिका का यह कदम इस महामारी के विरुद्ध सामूहिक उत्तरदायित्व को कम करेगा जो वैश्वीकरण  सिद्धांतो के भी विरुद्ध होगा।

भारत का योगदान

  • जहाँ एक ओर कई विकसित देश अपनी वैश्विक भूमिका में कमी ला रहे वहीँ दूसरी तरफ भारत अपनी वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को दृढ़ता के साथ निभा रहा।  भारत द्वारा क्षेत्रीय व वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक ज्ञान ,नियम तथा हायड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को उपलब्ध कराकर अपनी वैश्विक भूमिका के साथ मानवता की रक्षा हेतु सराहनीय कदम उठाये गए हैं।

WHO तथा भारत

  • भारत 12 जनवरी, 1948 को WHO संविधान का पक्षकार बना। दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए WHO क्षेत्रीय समिति का पहला अधिवेशन 4-5 अक्टूबर, 1948 को भारत के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यालय में आयोजित किया गया, और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया। ।
  • भारत में डब्ल्यूएचओ टीकाकरण कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण भागीदार रहा है, टीबी से निपटने और राज्यों में कुष्ठ रोग और कालाजार, और पोषण कार्यक्रम जैसे उपेक्षित रोग के निदान में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही
  • कोरोना के निदान में भी भारत तथा विश्व स्वास्थय संगठन सहयोगी के रूप में कार्य कर रहे है
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ECONOMY

Sovereign Gold Bond Scheme /सॉवरेन गोल्‍ड बॉन्ड योजना 2020-21-

भारत सरकार ने, भारतीय रिज़र्व बैंक के परामर्श से, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (Sovereign Gold Bond-SGB) जारी करने का निर्णय लिया है। ये बॉन्ड छह अवधि शृंखलाओं में अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 के मध्य जारी किये जाएंगे।

सॉवेरेन गोल्ड बॉन्ड की विशेषताएँ—

  • सॉवरेन गोल्‍ड बॉन्ड 2020 -2021 के नाम से ये बॉन्ड भारत सरकार की ओर से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किये जाएंगे।
  • इनकी बिक्री विभिन्‍न व्‍यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवार (HUFs), ट्रस्‍ट, विश्‍वविद्यालयों और धर्मार्थ संस्‍थानों जैसे निकायों तक ही सीमित रहेगी।
  • SGB को 1 ग्राम की बुनियादी इकाई के साथ सोने के ग्राम संबंधी गुणक में अंकित किया जाएगा।
  • इनकी 8 वर्ष की समयावधि होगी और पाँचवें साल के पश्चात इससे बाहर निकलने का विकल्प‍ रहेगा, जिसका इस्‍तेमाल ब्‍याज भुगतान की तिथियों पर किया जा सकता है।
  • SGB की न्‍यूनतम स्‍वीकार्य सीमा 1 ग्राम सोना है।
  • व्यक्तियों और HUFs के लिये 4 किलोग्राम तथा ट्रस्‍ट एवं इसी तरह के निकायों के लिये 20 किलोग्राम प्रति वित्त वर्ष (अप्रैल-मार्च) की अधिकतम सीमा होगी।
  • SGB की बिक्री अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (लघु वित्त बैंकों और भुगतान बैंकों को छोड़कर), स्‍टॉक होल्डिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SHCIL), नामित डाकघरों और मान्‍यता प्राप्‍त स्‍टॉक एक्‍सचेंजों जैसे कि नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड और बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज लिमिटेड के जरिये की जाएगी।
  • संयुक्‍त रूप से धारण किये जाने की स्थिति में 4 किलोग्राम की निवेश सीमा केवल प्रथम आवेदक पर लागू होगी।
  • बॉन्ड का मूल्‍य भारतीय रूपए में तय किया जाएगा। निर्गम मूल्‍य उन लोगों के लिये प्रति ग्राम 50 रुपए कम होगा जो इसकी खरीदारी ऑनलाइन करेंगे और इसका भुगतान डिजिटल मोड के जरिये करेंगे।
  • बॉन्ड का भुगतान नकद (अधिकतम 20,000 रुपए तक), डिमांड ड्राफ्ट, चेक अथवा इलेक्‍ट्रॉनिक बैंकिंग के जरिये की जा सकेगी।
  • निवेशकों को प्रति वर्ष 2.50 प्रतिशत की निश्चित दर से ब्याज दिया जाएगा, जो अंकित मूल्‍य पर हर छह महीने में देय होगा।
  • इनका उपयोग ऋणों के लिये जमानत या गारंटी के रूप में किया जा सकता है।
  • आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधान के अनुसार, स्‍वर्ण बांड पर प्राप्‍त होने वाले ब्‍याज पर कर अदा करना होगा। किसी भी व्‍यक्ति को SGB के विमोचन पर होने वाले पूंजीगत लाभ को कर मुक्‍त कर दिया गया है।
  • किसी भी निर्धारित तिथि पर बॉन्ड जारी होने के एक पखवाड़े के भीतर इनकी ट्रेडिंग स्‍टॉक एक्सचेंज पर हो सकेगी।
  • बैंकों द्वारा हासिल किये गए बॉन्डों की गिनती वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) के संदर्भ में की जाएगी।

Statutory Liquidity Ratio-SLR

  • यह भारत में कार्य करने वाले सभी अनुसूचित बैंकों ( देशी तथा विदेशी) की सकल जमाओं का वह अनुपात है जिसे बैंकों को अपने पास विद्यमान रखना होता है।
  • यह नकद तथा गैर नकद-स्वर्ण या सरकारी प्रतिभूति किसी भी रूप में हो सकता है।
  • वर्ष 2007 में इसकी 25 प्रतिशत की न्यूनतम सीमा को समाप्त कर दिया गया। अब यह 25 प्रतिशत के नीचे भी रखा जा सकता है।
  • SLR से बैंकों के कर्ज देने की क्षमता नियंत्रित होती है। अगर कोई बैंक मुश्किल परिस्थिति में फँस जाता है तो रिजर्व बैंक SLR की मदद से ग्राहकों के पैसे की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है।

सॉवेरेन गोल्ड बॉन्ड योजना के उद्देश्य:

  1. सोने की भौतिक मांग को कम करना, और
  2. प्रतिवर्ष निवेश के उद्देश्य से आयात होने वाले सोने के एक हिस्से को वित्तीय बचत में परिवर्तित करना।
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ECONOMY

भारत का GDP वृद्धि दर वित्त वर्ष 2020-21 में 4.8 प्रतिशत रहने का अनुमान : UNO क़ा विश्लेषण।

संयुक्त राष्ट्र के ‘एशिया और प्रशांत आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण (ESCAP)’ वर्ष 2020 की ओर से स्थायी अर्थव्यवस्थाओं के लिए जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 4.8 फ़ीसदी रहने का अनुमान है। यह भविष्यवाणी 10 मार्च, 2020 तक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर की गई थी।

वर्ष 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी 5 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था और विकास दर में वर्ष 2020-21 में 4.8 तक गिरावट का अनुमान है।इस रिपोर्ट में वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 5.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है।

पिछले कुछ महीनों में भारत की जीडीपी में काफी गिरावट आई है, इसकी वजह रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और एविएशन सेक्टर में मांग कम होना और क्रेडिट लिमिट का कम होना है. भारत की जीडीपी जुलाई-सितंबर 2019 की तिमाही में अपने पिछले 7 वर्षों में सबसे कम 4.5 फ़ीसदी थी।आय में कमी और बढ़ती बेरोजगारी ने भी भारत में विकास दर को धीमा किया है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में अनुमानित वृद्धि —👇🏻

केंद्रीय बजट 2020-21 से एक दिन पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद 6-6.5 फ़ीसदी तक बढ़ने का अनुमान लगाया गया है जोकि वर्ष 2019-20 में 5 फ़ीसदी था।

एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर कोविड -19महामारी का प्रभाव—-👇🏻

UN ESCAP रिपोर्ट 2020 में कहा गया है कि कोविड -19 महामारी के प्रकोप की वजह से अन्य देशों के साथ होने वाले पर्यटन, व्यापार और अन्य वित्तीय क्रियाकलापों में कमी के कारण एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

• 31 मार्च, 2020 तक कोविड – 19 के मामले लगातार बढ़ने के साथ ही नोवल कोरोनो वायरस महामारी पूरी दुनिया में तेजी से फैल रही है. कोविड-19 महामारी सबसे पहले चीन के वुहान शहर में बड़ी तेजी से फ़ैली और जल्दी ही पूरी दुनिया के कई देशों में फैल गई।

कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कई उपाय जैसेकि लॉकडाउन, क्वारंटाइन और अन्य कई उपाय अपनाये जाने के बावजूद, इस महामारी ने पहले ही एशिया और प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के साथ विश्व की अधिकतर अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है।

• कोविड-19 के परिणामस्वरूप, UN ESCAP रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारिक गतिविधियों में कमी के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जीडीपी में 0.6-0.8 फ़ीसदी तक की गिरावट आ सकती है।

विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर रहेगा जारी-👇🏻

वर्ष 2008 की तुलना में वित्त वर्ष 2019-20 में, विश्व अर्थव्यवस्था 2.3 फ़ीसदी की धीमी गति से बढ़ी, जबकि वर्ष 2018 में यह जीडीपी 3 फ़ीसदी थी. वर्ष 2020 में विश्व अर्थव्यवस्था के 2020-21 में 2.0 फ़ीसदी की वृद्धि के साथ धीमा होने की उम्मीद है.  

इसके अलावा, एशिया-प्रशांत क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मंदी को भारत, चीन और रूस जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने और अधिक बढ़ाया है।

UN ESCAP रिपोर्ट में सुझाए गए समाधान-👇🏻

विश्व अर्थव्यवस्था पर कोविड -19 के प्रभाव को दूर करने के लिए, एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सभी देशों सहित विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए और आपस में समन्वय और सहयोग को मजबूत करना चाहिए।

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NEWS ANALYSIS

COVID-19 के दौरान पैरोल देने के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट का आदेश

चर्चा में क्यों?—

कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिये उच्चतम न्यायालय द्वारा राज्यों से जेलों में भीड़ कम करने के आदेश के बाद दिल्ली, असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं अन्य राज्यों ने कैदियों को पैरोल पर रिहा करना शुरू कर दिया है। इनमें सात वर्ष या उससे कम की सजा पाने वाले अपराधी शामिल हैं।

  • दिल्ली में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा जमानत मानदंडों में छूट के कारण तिहाड़ जेल के 400 से अधिक कैदियों को रिहा किया गया है जबकि उत्तर प्रदेश ने 11,000 कैदियों को जमानत दी है।

मुख्य बिंदु: 

  • उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़ों का जिक्र करते हुये अपने आदेश में कहा है कि देश में 1339 जेलों में करीब 466084 कैदी हैं जो जेलों की क्षमता की तुलना में 117.6% अधिक है।
  • उल्लेखनीय है कि संप्रग सरकार के दौरान वर्ष 2010 में तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने जेलों में कैदियों की भीड़ कम करने के उद्देश्य से छोटे मोटे अपराध के आरोपों में बंद विचाराधीन कैदियों को पैरोल/जमानत पर रिहा करने का कार्यक्रम शुरू किया था।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A:

  • इसके तहत अगर कोई कैदी अपने कथित अपराध के लिये कानून में निर्धारित सजा की आधी अवधि पूरी कर चुका हो तो उसे जमानत या पैरोल पर रिहा किया जा सकता है। हालाँकि यह लाभ उन विचाराधीन कैदियों को नहीं मिल सकता जिनके खिलाफ किसी ऐसे अपराध में लिप्त होने का आरोप है जिनमें मौत की सजा का प्रावधान है या फिर कोई अन्य स्पष्ट प्रावधान किया गया हो।

जेलों में अंडरट्रायल कैदियों की क्षमता से अधिक संख्या:   

  • गौरतलब है कि दिल्ली की तिहाड़ जेल और संभवतः पूरे भारत में लगभग 82% कैदी अंडरट्रायल हैं।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है कि ये कैदी सात वर्ष से कम उम्र की सजा के स्वीकृत न्यायशास्त्र के तहत आते हैं तथा गैर-जघन्य माने जाने वाले शारीरिक नुकसान में सम्मिलित होते हैं।
  • वर्तमान में जेल प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती न्यायपालिका की मदद से अंडरट्रायल कैदियों की संख्या को कम करना है। जिसके लिये निम्नलिखित कदम उठाये जा रहे हैं-
    • भीड़ को कम करने के लिये नई जेलों का निर्माण किया जा रहा है।
    • न्यायालय के समक्ष अंडरट्रायल के तहत उचित समय पर उपस्थिति दर्ज करना जिससे कैदी की गैर मौजूदगी के कारण मुकदमा अधिक समय न ले।
    • नाबालिग अपराधों के निपटान के लिये तिहाड़ कोर्ट परिसर में विशेष अदालतों का नियमित रूप से आयोजन किया जा रहा है जहाँ प्रत्येक तीसरे शनिवार को अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध कबूल करना होता है।
    • गंभीर रूप से बीमार कैदियों के मामले को कानून के अनुसार जमानत पर रिहा करने के लिये ट्रायल कोर्ट का सहारा लिया जा रहा है।
    • जेल अधीक्षकों को यह सुनिश्चित करने के दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं कि रिहाई वारंट के संदर्भ में मामले में त्रुटि के कारण किसी भी कैदी को कर्मचारियों द्वारा अनावश्यक रूप से हिरासत में नहीं लिया जाए।
  • वहीं दोषियों के संदर्भ में एक से छह महीने के भीतर सजा देने के कार्यकारी विशेषाधिकार सिद्धांत का पालन किया जा रहा है।
    • यह एक मानक एवं संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, ये दोनों दृष्टिकोण अपराध से निपटने तथा कोरोनावायरस महामारी के प्रसार को रोकने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
  • हालाँकि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया तथ्य जमानत पर रिहा होने वाले कैदियों की ट्रैकिंग पर सवाल खड़ा करता है। जहाँ अधिकांश कैदी अपनी जमानत शर्तों का पालन करेंगे और नियमित रूप से स्थानीय पुलिस स्टेशनों में रिपोर्ट करेंगे वहीं कुछ ऐसे भी होंगे जो जमानत शर्तों का पालन एवं स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्टिंग नहीं करेंगे।

कैदियों की रिहाई एवं उनकी ट्रैकिंग:

  • सामान्य परिस्थितियों में भी पुलिस एवं जेल अधिकारियों के पास पैरोल पर छूटे या जमानत पर छूटे कैदियों को ट्रैक करने का कोई कारण एवं नियम नहीं है क्योंकि उन्हें ट्रैक करना असंभव है।
  • कैदियों का यह कानूनी दायित्व होता है कि वे जमानत/पैरोल की शर्तों का पालन करें। जिसके तहत उन्हें रिहा किया जा रहा है इसलिये कानून के अनुसार कार्य करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह उन पर निर्भर है।
  • यदि इन शर्तों का किसी भी प्रकार से उल्लंघन होता है तो रिलीज ऑर्डर को सीधे रद्द किया जा सकता है और यह भविष्य में व्यक्ति के खिलाफ जमानत से इनकार करने का एक बिंदु बन सकता है।

प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स-2018 (Prison Statistics-2018) रिपोर्ट

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के National Crime Records Bureau- NCRB द्वारा जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, पैरोल पर रिहा किये गए 31297 कैदियों में फरार होने वालों की संख्या मात्र 343 (1.1%) थी। जबकि पुलिस इनमें से 150 को गिरफ्तार करने में सफल रही।
  • रिपोर्ट बताती है कि जेल के लगभग 99% कैदी पैरोल की शर्तों का पालन करते हैं। इसके अलावा पुलिस प्रशासन कुछ शेष फरार लोगों को ट्रैक करने के लिये सक्षम है।

कैदियों की ट्रैकिंग करने के लिये तकनीक का सहारा:

  • कैदियों की ट्रैकिंग तथा नियमित अंतराल पर स्थानीय पुलिस स्टेशनों में रिपोर्ट करने के लिये तकनीक का सहारा लिया जा सकता है जिससे उनकी वर्तमान गतिविधियों की रिपोर्ट स्थानीय थाने में दर्ज हो सके और सुनिश्चित हो सके कि आत्म-निगरानी में रहते हुए उन पर दबाव बना रहें जिससे वे अपराध-मुक्त रहें एवं शांति बनाए रखें।

COVID-19 के सामुदायिक प्रसार को रोकना: 

  • COVID-19 महामारी के दौरान जेल में बंद कैदियों को रिहा करना चिकित्सकीय दृष्टिकोण से एक सकारात्मक कदम है क्योंकि प्रवासी श्रमिकों के संकेंद्रण के विपरीत कैदियों में अलगाव भारत में COVID-19 के सामुदायिक प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभायेगा।

जेलों का क्वारंटाइन वार्ड में परिवर्तन: 

  • पैरोल/जमानत पर छोड़े गए कैदियों के बाद जेलों में मुक्त हुए स्थान को जघन्य अपराधों की श्रेणी में आने वाले कैदियों के लिये सुरक्षित क्वारंटाइन वार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। और COVID-19 के सामुदायिक प्रसार के खतरे को भी कम किया जा सकता है।  

निष्कर्ष:

  • इस समय देश में 21 दिनों का लॉकडाउन चल रहा है और सरकारी मशीनरी का एक बड़ा हिस्सा इसे लागू करने एवं क्वारंटाइन करने के उपायों में व्यस्त है परिणामतः नागरिकों की गतिविधियाँ पहले से ही प्रतिबंधित है। लाकडाउन से संबंधित उपाय छोड़े गए कैदियों की गतिविधियों एवं उनके व्यवहार को ट्रैक करने में सहायता कर सकते हैं।
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ECONOMY

वैश्विक अर्थव्यवस्था और कोरोनावायरस/COVID-19 &World Economy

संयुक्त राष्ट्र (United Nations-UN) के अनुसारCOVID-19महामारी के कारण वर्ष 2020 में वैश्विक अर्थव्यवस्था तकरीबन 1 प्रतिशत तक कम हो सकती है। साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि यदि बिना पर्याप्त राजकोषीय उपायों के आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंध और अधिक बढ़ाया जाता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है।

मुख्य बिन्दु-

  • United Nations Department of Economic and Social Affairs- UN DESA द्वारा किये गए विश्लेषण के अनुसार, कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बाधित कर रही है।
  • ध्यातव्य है कि बीते महीने के दौरान लगभग 100 देशों ने अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बंद कर दिया है, जिसके कारण लोगों का आवागमन और पर्यटन की गति पूरी तरह से रुक गई है, जो कि वैश्विक वृद्धि में बाधा बन गया है।
  • DESA के अनुसार, ‘विश्व के लगभग सभी देशों में लाखों श्रमिकों को नौकरी के संकट का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा विभिन्न सरकारें कोरोनावायरस के प्रकोप से निपटने के लिये बड़े प्रोत्साहन पैकेजों पर भी विचार कर रही हैं, जिनके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है।’
    • उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था में 1.7 प्रतिशत की कमी आई थी।
  • विदित हो कि DESA द्वारा किये गए विश्लेषण के अनुसार, कोरोनावायरस (COVID-19) के प्रकोप से पूर्व विश्व उत्पादन में वर्ष 2020 में 2.5 प्रतिशत की गति से वृद्धि होने की उम्मीद थी।

चुनौतियाँ

  • अनुमान के अनुसार, यदि सरकारें आय सहायता प्रदान करने और उपभोक्ता को खर्च करने हेतु प्रेरित करने में विफल रहती हैं तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक कमी आ सकती है।
  • DESA के अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोनावायरस (COVID-19) की गंभीरता का प्रभाव मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करेगा- लोगों की आवाजाही और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंध की अवधि; और संकट के लिये राजकोषीय उपायों का वास्तविक आकार और प्रभावकारिता।
  • DESA के पूर्वानुमान के अनुसार, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में लॉकडाउन ने सेवा क्षेत्र को काफी बुरी तरह से प्रभावित किया गया है, विशेष रूप से ऐसे उद्योग जिनमें प्रत्यक्ष वार्ता शामिल है जैसे- खुदरा व्यापार, हॉस्पिटैलिटी, मनोरंजन और परिवहन आदि।
  • विश्लेषण के अनुसार, दुनिया भर के सभी व्यवसाय अपना राजस्व खो रहे हैं, जिसके कारण बेरोज़गारी में तेज़ी से वृद्धि होने की संभावना है।
  • विश्लेषण में यह भी चेतावनी दी गई है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में लंबे समय तक आर्थिक प्रतिबंधों का नकारात्मक प्रभाव जल्द ही व्यापार और निवेश के माध्यम से विकासशील देशों को प्रभावित करेगा।
    • यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका में उपभोक्ता खर्च में तेज़ी से हो रही गिरावट विकासशील देशों से उपभोक्ता वस्तुओं के आयात को प्रभावित करेगा।
  • पर्यटन और कमोडिटी निर्यात पर निर्भर विकासशील देश विशेष रूप से आर्थिक जोखिम का सामना कर रहे हैं।
  • इस महामारी के प्रभावस्वरूप वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में उल्लेखनीय कमी कर सकता है और यात्रियों की संख्या में हुई तीव्र गिरावट ऐसे देशों की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभैत करेगा जो मुख्य रूप से पर्यटन पर निर्भर हैं।

उपाय

  • विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर वायरस के प्रभाव को कम करने के लिये सही ढंग से तैयार किया गया राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज की आवश्यकता है, जिसमें वायरस के प्रसार को रोकने के लिये स्वास्थ्य व्यय को प्राथमिकता और महामारी से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करना शामिल हो।
  • आर्थिक और सामाजिक मामलों के महासचिव के अनुसार, सभी राष्ट्रों को कुछ तात्कालिक नीतिगत उपायों की आवश्यकता है, जो न केवल महामारी को रोकने और जीवन को बचाने की दिशा में कार्य करें बल्कि समाज में सबसे कमज़ोर व्यक्ति को आर्थिक संकट से बचाने और आर्थिक विकास तथा वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक हों।

स्रोत-Indian express

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NEWS ANALYSIS

लॉकडाउन का मानसून पूर्वानुमान प्रणाली पर प्रभाव/Monsoon forecasting system :-effect of lockdown

चर्चा में क्यों:

देश में लॉकडाउन के चलते नागरिक विमान उड्डयन पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण India Meteorological Department- IMD) की मानसून पूर्वानुमान प्रणाली प्रभावित हो सकती है।

मुख्य बिंदु:

  • विश्व की मौसम एजेंसियों द्वारा मौसम पूर्वानुमान के गतिशील मॉडल (Dynamical Model) में ऊपरी वायुमंडल के तापमान एवं हवा की गति मापन के आँकड़ों का उपयोग किया जाता है तथा इसके लिये उड्डयन आधारित विमान रिले डेटा (Aircraft Relay Data) का उपयोग किया जाता है।
  • मार्च माह के मध्य से भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया था तथा 24 मार्च तक घरेलू हवाई यात्रा पर भी पूर्णतया रोक लगा दी गई। इससे विमान रिले डेटा की प्राप्ति में उत्पन्न समस्या के कारण इस वर्ष IMD अपने पारंपरिक सांख्यिकीय पूर्वानुमान प्रणाली (Statistical Forecast System) के आधार पर मौसम पूर्वानुमान जारी करेगा।

मानसून पूर्वानुमान के मॉडल:

  • सांख्यिकीय मॉडल (Statistical System):
    • IMD वर्ष 2010 तक केवल इसी मॉडल का उपयोग मौसम पूर्वानुमान जारी करने में करता था।
    • इस मॉडल में उत्तरी अटलांटिक और उत्तरी प्रशांत के बीच समुद्र की सतह की तापमान प्रवणता, भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में गर्म पानी की मात्रा, यूरेशियन बर्फ का आवरण जैसे मानसून के प्रदर्शन से जुड़े जलवायु मापदंडों को शामिल किया जाता था।
    • उपरोक्त मापदंडों के फरवरी और मार्च के आँकड़ों की सौ वर्ष से अधिक के वास्तविक वर्षा के आँकड़ों से तुलना करने के बाद (सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग करते हुए) किसी एक विशेष वर्ष के मानसून का पूर्वानुमान लगाया जाता था।
  • गतिशील मॉडल (Dynamical Model):
    • वर्ष 2015 से ही मानसून पूर्वानुमान हेतु एक गतिशील प्रणाली का परीक्षण शुरू किया गया। इस प्रणाली में कुछ निश्चित स्थानों की भूमि और समुद्र के तापमान, नमी, विभिन्न ऊँचाई पर वायु की गति जैसे मापदंडों के आधार पर मौसम का अनुमान लगाया जाता है।
    • इस प्रणाली से प्राप्त आँकड़ों की गणना शक्तिशाली कंप्यूटरों के माध्यम से की जाती है। साथ ही मौसम के पूर्वानुमान में भौतिकी समीकरणों का भी प्रयोग किया जाता है।
  • एसेंबल प्रेडिक्शन सिस्टम (Ensemble Prediction Systems- EPS):
    • आगामी दस दिनों तक मौसम पूर्वानुमान करने के लिये IMD द्वारा EPS का उपयोग करता है अर्थात लघु अवधि के मौसम पूर्वानुमान में इसका बहुत महत्त्व है।

मौसम पूर्वानुमान तथा सुपर कंप्यूटर:

  • प्रत्यूष:
    • वर्तमान में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, (Indian Institute of Tropical Meteorology- IITM) पुणे में सबसे तेज़ सुपर कंप्यूटर लगाया गया है जिसे प्रत्यूष कहा जाता है। इसकी गति 4.0 पेटाफ्लॉप्स है। 
  • मिहिर:
    • नेशनल सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्टिंग (National Centre for Medium Range Weather Forecasting- NCMRWF) में मिहिर नामक सुपर कंप्यूटर लगाया गया है, जिसकी गति 2.8 पेटाफ्लॉप्स है।

आगे की राह:

  • उड्डयन प्रणाली आधारित रिले डाटा तापमान में होने वाले त्वरित परिवर्तन तथा तड़ितझंझा की चेतावनी देने के लिये सहायक होते हैं। इन आँकड़ों की लंबे समय तक अनुपलब्धता मौसम की प्रवृत्ति तथा भविष्य के जलवायु पैटर्न की गणना को बेहतर तरीके से समझने की वैज्ञानिक क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है। अत: इन आँकड़ों की शीघ्र प्राप्ति की दिशा में कार्य कर गतिशील मौसम पूर्वानुमान की दिशा में कार्य करना चाहिये।
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ECONOMY

Indian Rupee &COVID-19/ COVID-19और भारतीय रुपया-

US dollar and Indian Rupee

कोरोना वाइरस के कारण सम्पूर्ण विश्व में भयानक मंदी की स्तिथि उत्पन्न हो रही है । इस मंदी का प्रभाव भारत जैसे विकासशील देशों पर भी हो रहा है और यह आगे विकराल रूप धारण कर सकती है। इसी संदर्भ में भारतीय रुपए पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझना चाहिए।

Impact of the Pandemic/महामारी का प्रभाव-

मार्च २०२० में वैश्विक स्तर पर पोर्ट्फ़ोलीओ निवेशकों ने क़रीब 80 बिलियन डॉलर का निवेश बाज़ार से बाहर निकाला है।

भारत से इन निवेशकों ने क़रीब 15 बिलियन डॉलर का निवेश बाज़ार से बाहर निकाला। अर्थात् इन निवेशकों ने अपने शेयर बेचें और पैसा बाज़ार से निकाल लिया।इसका प्रभाव शेयर बाज़ार पर भी देखा जा रहा है। भारत के नैशनल स्टॉक एवम् मुंबई स्टॉक इक्स्चेंज दोनो में ही क़रीब 25-30% की गिरावट हुई है।

COVID-19

Status of Indian Rupee/ भारतीय रुपए की स्तिथि—

वैश्विक स्तर पर अस्थिरता के बावजूद रुपया क़रीब-क़रीब स्थिर ही रहा है ।इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि RBI ने समय समय पर इसे बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए है।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मार्च के अन्तिम सप्ताह में क़रीब 12 बिलियन डॉलर कम हुआ और इसका मुख्य कारण यह है कि पॉर्ट्फ़ोलीओ निवेशकों ने तेज़ी से अपना पैसा बाज़ार से निकाल और अपना हिस्सा बेचा।इससे भी रुपए में गिरावट आई।

What is The Concern/चिंता क्या है?—

सबसे बड़ी चिंता दीर्घकालिक रूप से है। RBI ने रुपये की स्थिरता के लिए जो प्रयास किए है वे वास्तव में RBI की उप गवर्नर उषा थोरोट की अध्यक्षता में गठित taskforce की शिफ़रिशों के अनुकूल नही है।इस Taskforce ने शिफ़ारिश की थी की RBI रुपए की स्थिरता के लिए जो भी प्रयास करें वे Offshore तथा Onshore मार्केट में एकीकृत रूप में होने चाहिए जबकि RBI ने इस नियम का पालन पूर्ण रूप में नही किया।और इस बात पर ही अधिक बल दिया कि रुपया Offshore मार्केट में अधिक स्थिर बना रहे। जबकि निवेशकों का विश्वास इस बात पर निर्भर करता है की RBI की नीति में संतुलन है अथवा नही और हस्तक्षेप एक सीमा तक ही हो।

अब आगे क्या?

जब COVID-19 का प्रभाव कम या समाप्त होगा तो RBI को इस प्रकार की रणनीति अपनानी होगी जिसके माध्यम से Offshore तथा Onshore दोनों प्रकार के मार्केट को टार्गेट किया जा सके।

जैसे ही कोरोना का प्रभाव कम होगा विश्व के सभी बड़े देशों के केंद्रीय बैंक तरलता में वृद्धि के उद्देश्य से बाज़ार में अधिक से अधिक मुद्रा डालेंगे ऐसी स्थिति में निवेश आकर्षित करना और भी अधिक मुश्किल होगा जिससे रुपये और डॉलर के मूल्य संतुलन पर भी प्रभाव पड़ेगा।अमेरिका के फ़ेडरल रिज़र्व ने यह कार्य आरम्भ भी कर दिया है।

RBI को Onshore मार्केट में भी तरलता बनाए रखने हेतु प्रयास करना होगा जिससे स्थानीय बाज़ार में माँग में वृद्धि हो तथा निवेशकों का विश्वास बढ़ाया जा सके।

इन दोनो ही कार्यों के दौरान RBI को यह भी ध्यान रखना होगा कि रुपये की स्थिरता के लिए किए गए प्रयास कही वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धा पर तो नकारात्मक प्रभाव नही नही पढ़ रहा।क्योंकि वर्तमान समय में निवेशक उन अर्थव्यवस्था की और अधिक आकर्षित होते है जो बाज़ार के नियमों से संचालित होती हो तथा जिनमें सरकार का हस्तक्षेप कम से कम हो।

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NEWS ANALYSIS

TABLIGHI JAMMAT NEWS

Tablighi Jamaat Building

Why in News?

Many attendees of a big religious congregation organised by the Tablighi Jamaat held in mid-March have been affected by novel coronavirus . 

What has happened after this gathering?

  • More than 400 people showing symptoms have been hospitalised in Delhi alone and nearly 240 have tested positive. 
  • The spectre of large-scale community spread by a few hundred attendees from different States cannot be ruled out. 
  • That the 3-day event began on March 13 when the Health Ministry said that it did not consider the novel coronavirus as a health emergency. 
  • After all, WHO had called COVID-19 a pandemic on March 11, 2020. 

Who is to be blamed?

  • The organisers should have been aware that a similar congregation organised by them in Malaysia in end-February led to a spike in cases there and the attendees carried the virus to other countries. 
  • Community leaders have been irresponsible, but those in the government have been lax too.
  • The Delhi government did nothing to stop such a meeting except issuing an order on March 13 prohibiting the assembly of more than 200 people. 
  • On March 6, the Centre advised the States to avoid or postpone mass gatherings till the pandemic was contained.
  • There is a question on what prevented the State government from following this March 6 advice.

Were there such gatherings at national level?

  • There have been several such large gatherings, religious and non-religious in the country, even after India reported its first case. 
  • Until the lockdown began, many places of worship were open and political events held. 
  • Each such event could have potentially seeded the virus into the population and should have therefore been cancelled or prevented. 
  • But India failed despite being aware how global congregations had led to an alarming spread of the virus, examples being the large outbreaks in South Korea, Singapore, southern Italy and Spain.

What could be done?

  • States that already have cases with a link to the Nizamuddin event should now use the lockdown period effectively.
  • They should actively find everyone who had attended the event, trace their contacts, quarantine, test and treat them without losing time.
  • Both South Korea and Singapore have demonstrated how meticulous tracing of contacts of a church event, isolation and aggressive testing helped prevent the highly infectious virus from spreading widely.
  • The last thing that India can afford in the war against the virus is the disease acquiring a religious or class colour.

Source: The Hindu

Credit-IASPARLIAMENT

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EDUCATION

India and Covid-19 Pandemic- Impacts,Measures& Challenges/ भारत एवं कोरोना वाइरस महामारी- प्रभाव,उपाय व चुनोतियाँ

Covid -19

कोरोना वाइरस विश्व भर में 30 हज़ार से अधिकलोगों जीवन लील चुका है और इससे लाखों लोग संक्रमित हो चुके है।

भारत भी इस महामारी का सामना कर रहा है भारत के क़रीब 30 लोगों की मृत्यु हो गई है और क़रीब 1500 लोग इससे संक्रमित हो चुके है।

हालाँकि भारत में अभी तक कम्यूनिटी ट्रैन्स्मिशन नही हुआ है और इटली तथा अमेरिका जैसे हालात नही है लेकिन यदि एसा होता है तो स्तिथि भयावह होगी।

Covid-19 है क्या/ what is covid-19?

इसका नाम लैटिन भाषा के शब्द corona पर आधारित है जिसका अर्थ है crown ।

इसे आरम्भ में वुहान वाइरस ( चीन) के नाम से जाना गया।

11 फ़रवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) ने इसे आधिकारिक रूप से इसे नोवेल कोरोना वाइरस या Covid-19 नाम दिया।

इस वाइरस का ओरिजिन कैसे हुआ यह अभी तक पूर्ण रूप से ज्ञात नही है।अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी शुरुआत वुहान(चीन) के seafood market से हुई।

यह वाइरस वास्तव में पशु से मानव में फैला है, सम्भवतः यह चमगादड़( bats) के सूप के माध्यम से मानव तक पहुँचा।

Seafood market wuhan

यह वाइरस चीन से आरम्भ होकर विश्व के क़रीब 200 देश तक पहुँच चुका है।

India and covid-19/भारत और कोरोना वाइरस—

भारत में इसके क़रीब 1500 मामले सामने आ चुके है तथा 30 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

भारत सरकार ने क्या प्रयास किए?—

भारत सरकार ने इसे आपदा घोषित किया।आपदा घोषित होने के बाद राज्यों को यह अधिकार प्राप्त हो ग़या वे राज्य आपदाराहत कोष का प्रयोग कर सकेंगे। राज्य अस्थाई आवास बनाना आरम्भ कर सकते है ताकि संदिग्ध लोगों को अलग रखा जा सके।लोगों के लिए राहत कार्य आरम्भ कर सकते है विशेषकर असंगठित क्षेत्र के लोगों व ग़रीबों के लिए।जाँच के लिए अतिरिक्त लैब की व्यवस्था कर सकते है।

जनता कर्फ़्यू/janata curfew-प्रधानमंत्री के आवाहन पर २२ मार्च को प्रातः7 बजे से रात्रि 9 बजे तक जनता कर्फ़्यू रखा गया। यह वास्तव में लॉक डाउन से पहले की रिहर्सल थी। जनता कर्फ़्यू को लोगों का व्यापक समर्थन मिला।

ः21-DayLockdown/21 दिन का लॉक डाउन— प्रधानमंत्री ने Epidemic Disease Act-1897 तथा आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 के तहत 21 दिनों के सम्पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा की( 24 मार्च को)। इस लॉक डाउन के अंतर्गत—

A-यातायात को स्थगित किया गया।

B-मैजिस्ट्रेट को विशेष अधिकार दिए गए।

C-आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की वस्तु व सेवा कार्य को प्रतिबंधित किया गया।

ःआर्थिक राहत की घोषणा-भारत सरकार ने असंगठित क्षेत्र, किसानों , ग्रामीण श्रमिकों आदि के लिए 1 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपए के राहत पैकेज़ की घोषणा की।

RBI के द्वारा राहत कार्य- RBI ने तीन माह के लोन EMI की राहत दी( हालाँकि यह बैंकों पर छोड़ा गया की वे किस तरह राहत देंगे) साथ ही RBI ने CRR, रेपो रेट आदि में भी छूट की घोषणा की ताकि बाज़ार में तरलता की कमी ना रहे( लॉक डाउन के दौरान व बाद में भी)

RBI Governor

21 दिन के लॉक डाउन का प्रभाव—

1-भारी संख्या में मज़दूरों का पलायन आरम्भ हुआ, ये वे मज़दूर है जो अपने राज्य को छोड़कर काम हेतु किसी अन्य राज्य में गए थे।

2- ग्रामीण क्षेत्र में किसानों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा क्योंकि यह फसल कटाई का समय है।

3- आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर अविश्वास उत्पन्न हुआ जिससे जिससे जमाख़ोरी को भी बढ़ावा मिला।

4-भारत का असंगठित क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हुआ, इससे न केवल भारत का सकल घरेलू उत्पाद प्रभावित हुआ वरण मज़दूरों में ग़रीबी एवं भुखमरी में वृद्धि हुई क्योंकि लोग लम्बे समय तक बेरोज़गार हो गए।

5- लोगों में जागरूकता की कमी के कारण अनेक स्थानों पर प्रशासन को बल प्रयोग भी करना पड़ा।

भारत के सामने चुनोतियाँ( Challenges while combating covid19)—

1-Limited Testing Facilities/ सीमित जाँच सुविधा- भारत में जाँच की सुविधा अत्यधिक कम हैं ।अभी तक क़रीब 40 हज़ार जाँचे ही हो सकी है, जबकि आबादी १३० करोड़ है इस अनुपात में यह अत्यधिक कम है।लेकिन covid-19 को रोकने के लिए अत्यधिक जाँच आवश्यक है।

2-Lack of Strong Healthcare/अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव-यह भी एक बड़ी चुनोति है।विकसित देशों के मुक़ाबले भारत में सुविधाएँ अत्यधिक कम है। सबसे अधिक ज़रूरत वैंटीलेटर की होगी , भारत में इनकी अत्यधिक कमी है। भारत क़रीब 70% वैंटीलेटर आयात करता है जबकि इस समय इनकी व्यापक माँग है अतः पूर्ति में दिक़्क़त हो रही है।

3- Limited Number of beds in hospital/अस्पताल में सीमित पलंग—भारत में प्रति 1000 व्यक्तियों पर क़रीब 0.55 ही पलंग है। चीन में यह प्रति 1000 व्यक्तियों पर 4.3 पलंग है।इसका आशय है की यदि कम्यूनिटी ट्रैन्स्मिशन होता है तो निपटना मुश्किल होगा।

4-Population Density/ जनसंख्या घनत्व-भारत में जनसंख्या अत्यधिक सघन है प्रति वर्ग किलो मिटर में क़रीब 450 लोग निवास करते है। भारत के दिल्ली ,मुंबई,कोलकाता,चेन्नई,बंगलुरु,जयपुर आदि नगर अधिक सघन है और साथ ही इनकी एक बड़ी आबादी झुग्गियों में भी निवास करती है। यदि यहाँ इटली की तरह कोरोना फैला तो हालात क़ाबू में नही आएँगे।

5-India’s Elderly At High Risk/ भारत की वृद्ध आबादी – भारत में १० करोड़ से भी अधिक लोग एसे है जिनकी आयु 60 वर्ष से अधिक है यह आबादी इटली की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। और यह सर्वविदित है कि कोरोना इस आयु वर्ग को सर्वाधिक प्रभावित करता है।

6-Lack of knowledge about covid-19 in common peoples/ आम लोगों में कोरोना को लेकर जानकारी का अभाव है।

Covid -19
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ECONOMY

Corona,Unorganised Sector And The Government/ कोरोना, असंगठित क्षेत्र और सरकार।

Labour Distribution

एक अर्थव्यव्स्था में असंगठित क्षेत्र ऐसे क्षेत्र को कहा जाता है “जिसमें प्रत्येक आर्थिक क्रियाकलाप( उत्पादन,विपणन और विक्रय) में 10 से कम श्रमिक कार्य करते है और जो सामान्यतः निजी व्यक्ति या व्यक्ति के समूह के द्वारा संचालित होते है।”

आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार भारत के कुल वर्क फ़ोर्स का 93% हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। देश में लगभग 45 करोड़ कार्य बल है जिसमें से 41.5 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।

नीति आयोग(2018) के अनुसार वर्क फ़ोर्स लगभग 85% हिस्सा असंगठित क्षेत्र से है।

यानी ये ऐसे लोग है जो ऐसे क्षेत्र में कार्यरत है जहां ना वेतन की सुरक्षा है और ना ही किसी प्रकार की भविष्य निधि का प्रावधान।

एक अनुमान के अनुसार असंगठित क्षेत्र में कार्यरत एक मज़दूर सामान्यतः महीने के चार से पाँच हज़ार रुपये कमाता है और यह भी तब जब वह किसी नगर अथवा क़स्बे में कार्य करे।असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों की निम्नलिखित समस्याएँ होती है-

1. रोज़गार की अनिश्चिता- यह सबसे बड़ी समस्या है जब भी कारोबार प्रभावित होता है ऐसे लोगों को हटा दिया जाता है बिना किसी नोटिस के

2. पेंशन अथवा भविष्य निधि के सम्बंध में कोई विशेष व्यवस्था नही ।हालाँकि अटल पेंशन योजना के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया लेकिन यह व्यावहारिक रूप में सफल नही रहा क्योंकि लोगों में जागरूकता का अभाव है।

3. कार्यस्थल पर बड़ी चोट की स्थिति में भविष्य अंधकारमय हो जाता है।

4. बच्चों को उचित शिक्षा नही मिल पाती और ना ही परिवार को अच्छा आहार मिल पाता है।

5. नगरों अथवा क़स्बों में झुग्गियों में ऐसे श्रमिक निवास करते है , जँहा का माहोल एवम् सुविधाएँ अच्छा जीवन स्तर के लायक़ नही होती।

क़ोरोना का प्रभाव—-

क़ोरोना महामारी का सबसे बुरा प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ा है।

क़ोरोना के कारण देश में एतिहासिक लॉक डाउन करना पड़ा। एसी स्थिति में इस क्षेत्र में कार्यरत लोग बड़ी संख्या में बेरोज़गार हो गए , हालाँकि सरकार ने कहा है कि इनका वेतन ना काटा जाए पर यह सर्वविदित है कि उन्हें वेतन नही मिलने वाला।

इस महामारी ने असंगठित क्षेत्र में दो बड़ी समस्याओं को जन्म दिया-

1.भूख– यह एक विकराल समस्या है। इस क्षेत्र में कार्यरत लोगों के पास अधिक संसाधन नही होते एसी स्थिति में ये लोग अधिक समय तक अपनी ज़रूरतें पुरी नही कर सकते।

2.पलायन- यह एक गम्भीर समस्या है जिसका समाधान अगले एक दो दिन में ही करना होगा। लॉक डाउन की घोषणा के कुछ दिन बाद ही बड़ी संख्या में लोगों ने अपने गृह राज्य की ओर पलायन आरम्भ कर दिया । दिल्ली, मुंबई, मैसूर, हैदराबाद आदि नगरों का घटनाक्रम इसका उदाहरण है। उत्तरप्रदेश के लगभग 40 लाख, बिहार के लगभग 36 लाख, राजस्थान के लगभग 18 लाख लोग अन्य राज्यों में कार्यरत है। ये लोग कुछ मात्रा में पलायन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से करेंगे ही।

सरकारें क्या करें-

1. सबसे पहले केंद्र सरकार राज्यों के लिए इस सम्बंध में दिशा निर्देश जारी करे ताकि एकीकृत व्यवस्था की जा सके

2. राज्य सरकारें तत्काल प्रभाव से एसे श्रमिकोंके लिए भोजन ,पानी व अस्थाई निवास की व्यवस्था करें केवल दावों से काम नही चलने वाला।

3.श्रमिक जिन राज्यों की ओर पलायन कर रहे है उन राज्यों की सरकारों को राज्य की सीमा पर अस्थाई कैम्प विकसित करें ताकि लॉक डाउन का उद्देश्य प्रभावित ना हो।

4. पलायन करने वाले लोगों को जागरुक किया जाए, वे अफ़वाहों पर ध्यान न दे। लोगों को समझाया जाए कि एसा करने से उनके साथ साथ उनके परिवार का जीवन भी ख़तरे में आ सकता है। इसके बाद भी लोग नही मानते है तो उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो।

बाक़ी रही बात आर्थिक उपाय की तो वह वित्त मंत्रालय( भारत सरकार) पहले ही कार्य कर रहा है।

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HISTORY BEHIND THE ORIGIN AND ABOLITION OF SATI SYSTEM IN INDIA/ भारत में सती प्रथा का आरम्भ एवं समाप्ति।

इस कुप्रथा का आरम्भ संभवतःगुप्तकाल के आसपास हुआ था। गुप्त शासक भानुगुप्त के एरण अभिलेख(510 ईस्वी) में इस प्रथा के बारे में उल्लेख मिलता है।इस प्रथा के तहत स्त्री अपने पति के शव के साथ स्वयं को भी जला लेती थी। इसके पर्याप्त साक्ष्य है कि इसके लिए समाज का दबाव होता था तथा सती होने वाली महिला को नशीला पदार्थ खिला दिया जाता था ताकि उसे कुछ पता ना चला। जब भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना हुई तब भी इस प्रथा का प्रचलन था।कम्पनी के प्रयास-

कम्पनी इस प्रथा को समाप्त करने के सम्बंध में बहुत अधिक सावधानी से कार्य कर रही थी क्योंकि इस समय कम्पनी को विद्रोह का डर था। १८ वीं सदी के अंत तक कलकत्ता सप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रथा को समाप्त करने के प्रयास आरम्भ कर दिए थे।इसी समय श्रीरामपुर ,चिनसुरा,चंद्रनगर आदि स्थानों पर इस प्रथा को हतोत्साहित किया जाने लगा था। 1770 से 1780 के मध्य बम्बई प्रेज़िडेन्सी ने भी सी पर प्रतिबंध का प्रयास किया था।लेकिन कोई क़ानून नही बनाया जा सका ।
शाहबाद के कलेक्टर एम. एच. ब्रुक ने कार्नवालिस को लिखा था इस कुप्रथा को रोकने के लिए नियम बनाने की ज़रूरत है लेकिन गवर्नर जनरल हिचकिचा रहा था क्योंकि उसे विद्रोह का डर था।कार्नवालिस ने अपने लोगों को सलाह दी थी कि वे इस प्रथा को हतोत्साहित करे लेकिन बल प्रयोग ना करे।
1813 में मजिस्ट्रेटों तथा अन्य अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया कि वे एक स्त्री को सती होने से उस दशा में रोक सकते है यदि सती होने के लिए बल प्रयोग किया गया हो या वह नाबालिग हो या गर्भवती हो।
1817 में यह नियम बनाया गया कि एसी स्त्री सती नही हो सकती जिसके नाबालिग संतान हो जिसकी देखभाल करने वाला कोई ना हो।लेकिन सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध नही लगाया।

भारतीयों का योगदान-

उपर्युक्त परिस्थितियों में ही कुछ प्रगतिशील भारतीयों ने भी प्रयास आरम्भ किए।राजा राम मोहन राय इनमे अग्रणी थे।राम मोहन राय ने अपनी भाभी को सती होते हुए देखाथा।

राजा राम मोहन राय

राजा राम मोहन राय ने 1818 में सरकार को पत्र लिखकर बताया था कि यह प्रथा शास्त्रों के अनुसार आत्महत्या है ।इन्होंने संवाद कौमुदी नामक पत्रिका के माध्यम से सती प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास किया।
लेकिन इसी समय राधाकान्त देव के नेतृत्व में कुछ रूढ़िवादी नेताओ ने सती प्रथा के समर्थन में प्रचार आरम्भ किया इन्होंने चंद्रिका नामक पत्रिका के माध्यम से यह कार्य कियाथा।

विलियम बैंटिक का प्रयास-

इन्ही परिस्तिथियों में जुलाई 1828 में विलियम बैंटिक भारत आया , यह सुधारवादी विचारोंसे युक्त था।

विलियम बैंटिक

राधाकान्त देव ने चंद्रिका नामक पत्रिका के माध्यम से बैंटिक को बताया कि सती प्रथा एक आदरणीय प्रथा है सरकार इसे समाप्त ना करे लेकिन बैंटिक ने ध्यान नही दिया।
4 दिसम्बर 1829 को रेग्युलेशन 17th के माध्यम से सती प्रथा को बंगाल में दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया।1830 में इसे बम्बई व मद्रास में भी अपराध घोषित कर दिया गया।
लेकिन अभी तक यह ब्रिटिश भारत में ही लागू हुआ। धीरे धीरे देशी रियासतों ने भी अपराध घोषित किया जैसे अहमदनगर(1836),जूनागढ़(1838),सतारा(1846),पटियाला(1847) आदि।हालाँकि इसके बाद भी रूढिवादियों ने प्रयास जारी रखा इन्होंने जनवरी1830 में England की प्रिवी काउन्सिल में अपील की जिसे 1832 में ख़ारिज कर दिया गया ।
इस तरह सती प्रथा सैद्धांतिक रूप से समाप्त हो गई लेकिन व्यावहारिक रूप में इसका प्रचलन स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहासितम्बर 1987 मै राजस्थान के सिकर ज़िले में रूप कंवर सती हुई थी।

रूप कंवर सती स्थल

रूप कंवर सती कैस भारत में सती प्रथा का अंतिम ज्ञात कैस माना जाता है।

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क्या केवल लॉकडाउन समाधान है??

२४ मार्च की आधी रात से भारत लॉकडाउन है , लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण और यह ज़रूरी भी है क्योंकि इस महामारी को फ़ेलने से रोकने का यही एक तरीक़ा है। लेकिन क्या लॉकडाउन करने मात्र से यह समस्या हल हो जाएगी तो इसका उत्तर है नही । हमें इसके आगे भी कार्य करना होगा ।भारत में इसे खोज कर समाप्त करना होगा। अभी भी लोग जागरुक नही है वे अपने को घर के अंदर नही रख रहे विशेसकर छोटे क़स्बे और गाँव में।

एक बात और भी कि इस समय फसल की कटाई भी चल रही है एसे में किसान स्वयं को कैसे रोक पाएगा इसके बारे में भी सोचना होगा आज वित्त मंत्री ने अनेक घोषणाएँ की लेकिन फसल के नुक़सान को लेकर कोई बात नही थीं।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही बड़ी संख्या में मज़दूर घर की और पलायन कर रहे है यह पलायन भी भुखमरी तथा corona का फ़ेलाव दोनो कोबढ़ावा देगा। ये मज़दूर लम्बी दूरी तय करेंगे दिन के उजाले में या फिर अंधेरे में पर करेंगे ज़रूर , एसी स्थिति में इस बात की क्या गारंटी है corona का संक्रमण नही होगा?

एक और बात यह कि यदि ये लॉक डाउन आगे बढ़ा तों लोगों केसे रोक जाएगा क्योंकि बड़ी संख्या एसे लोगों की है जिनके लिए ये 21 दिन भी बहुत बड़ी मुसीबत बन गए है।

हमें इन सभी बातों पर काम करना होगा आगे के लिए भी तेयार रहना होगा एवम् corona को खोज कर समाप्त करना होगा