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भारत के द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नियमो में संशोधन/ Amendment in FDI rules by India-

भारत ने हाल ही में अपनी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नीति को संशोधित किया है, जो COVID-19 के प्रकोप से प्रेरित लॉकडाउन द्वारा प्रभावित फर्मों के “अवसरवादी अधिग्रहण” को रोकने के उद्देश्य को धारित करता है ।

FDI क्या है?-

  • एक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) एक देश में किसी अन्य देश में स्थित इकाई द्वारा किसी व्यवसाय में नियंत्रित स्वामित्व के रूप में एक निवेश है। इस प्रकार यह प्रत्यक्ष नियंत्रण की धारणा के आधार पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से अलग है।
  • निवेश की उत्पत्ति परिभाषा को प्रभावित नहीं करती है, एक एफडीआई के रूप में: निवेश को लक्ष्य देश में एक कंपनी खरीदकर या “संगठित रूप से” उस देश में मौजूदा व्यवसाय के संचालन का विस्तार करके किया जा सकता है।
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत 1991 में विदेशी निवेश शुरू किया गया था
  • 2015 में, भारत चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष एफडीआई गंतव्य के रूप में उभरा। भारत ने क्रमशः चीन के 28 बिलियन डॉलरऔर अमेरिका के 27 बिलियन डॉलर की तुलना में $ 31 बिलियन का एफडीआई आकर्षित किया।

FDI के मार्ग

  • क्षेत्रों के अंतर्गत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति या तो स्वचालित मार्ग या सरकारी मार्ग से होती है।
  • स्वचालित मार्ग के तहत, अनिवासी या भारतीय कंपनी को भारत सरकार से किसी भी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
  • जबकि, सरकारी मार्ग के तहत, निवेश से पहले जीओआई के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। सरकारी मार्ग के तहत विदेशी निवेश के प्रस्तावों पर संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय / विभाग द्वारा विचार किया जाता है

भारत सरकार द्वारा नवीन संशोधन-

  • सरकार ने कहा कि पड़ोसी देशों में भारतीय कंपनियों में निवेश करने की इच्छुक फर्मों को पहले इसकी मंजूरी की आवश्यकता होगी। किसी ऐसे देश की एक इकाई जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करती है, अब यहां “केवल सरकारी मार्ग के तहत” फर्मों में निवेश कर सकती है।
  • यह “लाभकारी” मालिकों पर भी लागू होता है – भले ही निवेश कंपनी पड़ोसी देश में स्थित नहीं है, फिर भी यह इन शर्तों के अधीन होगा यदि इसका मालिक एक नागरिक या ऐसे देश का निवासी है।
  • जबकि नोट में किसी भी देश का नाम नहीं था, विश्लेषकों ने संशोधन को संभावित चीनी निवेश पर रोक के उद्देश्य से देखा।
  • यह फैसला चीन के केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBoC) द्वारा HDFC में अपनी हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से अधिक करने के कुछ दिनों बाद हुआ। PBoC मार्च 2019 तक HDFC में 0.8% का मालिकाना शेयरधारक था।
  • चीन का एफडीआई निवेश भारत में 2014 के बाद से पांच गुना बढ़ गया है और दिसंबर 2019 तक, भारत में इसका संचयी निवेश $ 8 बिलियन से अधिक हो गया है – चीनी सरकार के अनुसार, भारत के साथ सीमा साझा करने वाले अन्य देशों के निवेश की तुलना में चीन “कहीं अधिक” भारत में $ 26 बिलियन से अधिक के कुल वर्तमान और नियोजित चीनी निवेश को दर्शाता है

भारत सरकार के तर्क:-

  • भारत का कहना है कि नीति किसी एक देश के उद्देश्य से नहीं है और यह कदम भारतीय फर्मों के “अवसरवादी” अधिग्रहण को रोकने के उद्देश्य से है, जिनमें से कई लॉक डाउन के कारण तनाव में हैं।
  • “संशोधन निवेश पर रोक नहीं लगा रहे हैं। भारत ने इन निवेशों के लिए अनुमोदन मार्ग को ही बदल दिया। भारत में कई क्षेत्र ऐसे हैं जो पहले से ही इस अनुमोदन मार्ग के अधीन हैं, कई अन्य देश इस तरह के उपाय कर रहे थे।

इन संशोधन पर चीन की प्रतिक्रिया: –

  • चीन ने भारत से इन “भेदभावपूर्ण प्रथाओं” को संशोधित करने और विभिन्न देशों से समान रूप से निवेश नियमो का आह्वान किया है। “विशिष्ट देशों के निवेशकों के लिए भारतीय पक्ष द्वारा निर्धारित अतिरिक्त बाधाएं डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) के गैर-भेदभाव के सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं, और व्यापार और निवेश की उदारीकरण और सुविधा की सामान्य प्रवृत्ति के विरुद्ध जाती हैं।
  • चीन के अनुसार अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण, पारदर्शी, पूर्वानुमानित और स्थिर व्यापार और निवेश वातावरण का एहसास करने के लिए और हमारे बाजारों को खुला रखने के लिए जी 20 नेताओं और व्यापार मंत्रियों की आम सहमति के अनुरूप नहीं है।

नवीन संशोधन पर विशेषज्ञों के विचार: –

  • कुछ विशेषज्ञो के अनुसार संशोधन केवल सीमावर्ती देशों पर लागू होते हैं। “अब, निवेश के एक ही सेट के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, जिसके आधार पर कंपनी किस देश से निवेश कर रही है।
  • यह वह जगह है जहां भेदभाव का संभावित मुद्दा प्रखर होता है , हालांकि भारत घरेलू निवेश के पक्ष में भेदभाव कर सकता है, लेकिन गैर-सुरक्षा कारणों से कुछ देशों के खिलाफ भेदभाव वैश्विक स्तर पर अनुकूल नहीं देखा जा सकता है।”तथा यह भारत की व्यापार सुगमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
  • विशेषज्ञ ने कहा कि यदि व्यापार से संबंधित सेवाओं में सामान्य समझौते के तहत गैर-भेदभावपूर्ण दायित्वों का एक संभावित उल्लंघन हो सकता है, । “अधिकांश अन्य देशों ने जो अपने निवेश नियमों को कड़ा कर दिया है, उन्होंने सर्वसम्मति से किया है, जिसका अर्थ है कि यह सभी देशों पर लागू होगा।”
  • यह कदम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में फेसबुक ने रिलायंस जियो में कुछ हिस्सेदारी हासिल की है।

इस मुद्दे पर वैश्विक स्थिति : –

  • भारत से पहले, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया ने इसी तरह के उपायों की शुरुआत की थी। ये, फिर से, चीनी निवेश पर लक्षित होने के रूप में देखे गए।
  • 25 मार्च को, यूरोपीय आयोग ने ऐसे समय में विदेशी निवेश स्क्रीनिंग के लिए “एक मजबूत यूरोपीय संघ-व्यापक दृष्टिकोण” सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। इसका उद्देश्य यूरोपीय संघ के विदेशी निवेश को सामान्य रूप से कम किए बिना यूरोपीय संघ की कंपनियों और महत्वपूर्ण संपत्तियों को संरक्षित करना था, विशेष रूप से स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में जो सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक थे, ।
  • ऑस्ट्रेलिया ने अस्थायी रूप से विदेशी अधिग्रहणों पर नियमों को कड़ा कर दिया है, इस चिंता से कि रणनीतिक संपत्ति सस्ते में बेची जा सकती है। इसके बाद चेतावनी दी गई कि विमानन, माल और स्वास्थ्य क्षेत्रों में परेशान ऑस्ट्रेलियाई कंपनियां राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों, विशेष रूप से चीन द्वारा खरीद के लिए असुरक्षित हो सकती हैं। सभी विदेशी अधिग्रहण और निवेश प्रस्तावों की अब ऑस्ट्रेलिया के विदेशी निवेश समीक्षा बोर्ड द्वारा जांच की जाएगी।
  • स्पेन, इटली और अमेरिका ने भी निवेश से संबंधित प्रतिबंध लागू किए हैं,

भारत सरकार के पिछले प्रयास : –

  • कुछ देशों के लिए अतिरिक्त आवश्यकताओं को लागू करने का कदम अभूतपूर्व है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक, भारत ने कुछ क्षेत्रों में निवेश पर इस तरह के उपाय किए हैं।
  • उदाहरण के लिए, जबकि 2011 तक स्वचालित मार्ग के तहत फार्मास्यूटिकल्स में एफडीआई की अनुमति दी गई थी, सरकार ने इस क्षेत्र में आने वाले किसी भी निवेश के लिए अनुमोदन अनिवार्य कर दिया था।
  • “ऐसा कुछ विदेशी कंपनियों द्वारा भारत के फार्मास्युटिकल उद्योग में निवेश बढ़ाने के इरादे से इन संस्थाओं को संभावित रूप से संभालने के इरादे से अलर्ट किए जाने के बाद हुआ था। यह निर्णय राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया था। 2014 में नई सरकार के निर्वाचित होने के बाद, नीति को उदार बनाया गया था, लेकिन अब भी स्वत: निवेश के तहत केवल 74 प्रतिशत तक निवेश की अनुमति है, “
  • 2010 में, सरकार ने जापान तम्बाकू की हालिया घोषणाओं के बाद सिगरेट निर्माण में एफडीआई पर प्रतिबंध लगा दिया कि वह अपनी भारतीय सहायक कंपनी में हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर देगी। अतीत में, भारत ने चीन के साथ द्विपक्षीय गतिरोध के दौरान कुछ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भी रोक दिया है,
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अंबुबाची मेला/ Ambubachi Mela

COVID-19 के कारण इस वर्ष गुवाहाटी (असम) के कामाख्या मंदिर में अंबुबाची मेला (Ambubachi Mela) का आयोजन नहीं किया जायेगा।

  • इस मेले का आयोजन गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में पीठासीन देवी की वार्षिक माहवारी (Annual Menstruation) को दर्शाने वाले त्योहार के अवसर पर किया जाता है।
  • पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कामाख्या मंदिर का निर्माण दानव राजा नरकासुर ने करवाया था। यह मंदिर नीलाचल पहाड़ियों (Nilachal Hills) के ऊपर अवस्थित है जिसका उत्तरी भाग ब्रह्मपुत्र नदी के तटीय ढाल तक जाता है।
    • किंतु इस मंदिर से संबंधित वर्ष 1565 के बाद के प्राप्त अभिलेखों में इसका पुनर्निर्माण कोच (Koch) साम्राज्य के राजा नर नारायण (Nara Narayana) ने कराया था।
  • कामाख्या, 51 शक्तिपीठों में से एक है जो शक्ति पंथ के अनुयायियों के लिये एक पवित्र स्थल है। शक्ति पंथ में ईश्वर की पूजा माता या देवी के रूप में की जाती है।
  • उल्लेखनीय है कि COVID-19 के कारण पिछली 6 शताब्दियों में पहली बार इस उत्सव का आयोजन नहीं किया जायेगा।

मेले का आयोजन

  • असम राज्य के गुवाहाटी शहर में आयोजित होने वाला यह पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है। 
  • अंबुबाची मेले का आयोजन प्रत्येक वर्ष 21-25 जून के मध्य (असम के अहार (Ahaar) महीने में) जब सूर्य मिथुन राशि में होता है, किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मेले के दौरान तीन दिन के लिये देवी के रजस्वला (Menstruation) होने के कारण कामाख्या मंदिर के कपाट स्वयं बंद हो जाते हैं। 

तुलोनी बिया रस्म-

  • ऐसा माना जाता है कि कामाख्या मंदिर में वार्षिक माहवारी (Annual Menstruation) को चिह्नित करने वाले कर्मकांड आधारित इस त्योहार के कारण भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में असम में मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाएँ कम हैं।
  • असम में लड़कियों में नारित्त्व (Womanhood) की प्राप्ति एक रस्म के साथ मनाई जाती है जिसे तुलोनी बिया (Tuloni Biya) कहा जाता है जिसका अर्थ ‘छोटी शादी’ है।
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कच्चे तेल की क़ीमत में गिरावट- कारण और प्रभाव/ Crude oil price drop – Causes and Effects-

कच्चे तेल का अमेरिकी सूचकांक वेस्ट टैक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) के सोमवार को शून्य से नीचे 37 डॉलर प्रति बैरल तक फिसलने के बाद दुनिया के तेल एवं वित्तीय बाजारों में गिरावट देखने को मिल रही है।

कीमतों में गिरावट के मुख्य कारण:-

  • कच्चे तेल के वायदा कारोबार में कीमतों में गिरावट आई है। वायदा कारोबार में खरीदार एक खास समय में निर्धारित कीमत पर कच्चा तेल वायदा खरीदने के लिए सौदा करता है। गिरावट की मुख्य वजह ताजा डिलिवरी लेने और भंडारण लागत से बचने के लिए कारोबारियों द्वारा अपना माल घटाए जाने की कोशिश करना था। डब्ल्यूटीआई कीमतें 0.10 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई थीं, जो गिरावट से मामूली सुधार था।
  • अमेरिकी तेल के लिए बेंचमार्क कीमत कोविड-19 महामारी के प्रसार से पहले 50 डॉलर प्रति बैरल थी और मौजूदा कमजोरी वैश्विक मांग में एक-तिहाई की गिरावट की वजह से आई है। अमेरिका में लॉकडाउन के बाद लोगों द्वारा ईंधन का कम इस्तेमाल किए जाने से मांग में कमजोरी को बढ़ावा मिला है।
  • ओपेक, रूस, अमेरिका और जी-20 देशों समेत तेल उत्पादकों द्वारा वैश्विक उत्पादन प्रति दिन 1 करोड़ बैरल तक घटाने को लेकर सहमति जताई गई है। हालांकि मौजूदा कमजोर कीमतों से संकेत मिलता है कि यह प्रयास मौजूदा चिंताओं को दूर करने के उपायों के अंतर्गत कम प्रभावी है क्योंकि मांग में हर दिन 3 करोड़ बैरल तक की कमी आई है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि दुनिया में जरूरत की तुलना में ज्यादा तेल उपलब्ध है, अथवा लोग लॉक डाउन इत्यादि कारणों से तेल का कम प्रयोग कर रहे हैं।

कीमतों में उतार-चढ़ाव के सामान्य कारण-

  • तेल की कीमतें विभिन्न कारकों से प्रभावित होती हैं, लेकिन विशेष रूप से पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा किए गए उत्पादन के बारे में निर्णयों के प्रति उत्तरदायी हैं।
  • किसी भी उत्पाद की तरह, आपूर्ति और मांग के कानून कीमतों को प्रभावित करते हैं; स्थिर मांग और ओवर सप्लाई के संयोजन ने पिछले पांच वर्षों में तेल की कीमतों पर दबाव डाला है।
  • प्राकृतिक आपदाएं जो संभावित रूप से उत्पादन को बाधित कर सकती हैं, और मध्य पूर्व जैसे तेल-उत्पादक क्षेत्रों में राजनीतिक अशांति भी मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती हैं।
  • उत्पादन लागत भंडारण की क्षमता के साथ-साथ कीमतों को प्रभावित करती है; हालांकि कम प्रभावशाली, ब्याज दरों की दिशा वस्तुओं की कीमत को भी प्रभावित कर सकती है।

कोरोनोवायरस का प्रभाव :-

  • कोरोनावायरस ने दुनिया भर में ऊर्जा की मांग को कम कर दिया है, लेकिन विशेष रूप से चीन में, जो सबसे बड़ा आयातक है।
  • विश्व के सभी देशो में कारखानों को निष्क्रिय कर दिया गया है और चीन के वुहान में शुरू होने वाले कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण दुनिया भर में हजारों उड़ानें रद्द हो गई हैं, ।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने सोमवार को कहा कि उसे उम्मीद है कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद 2009 में मंदी के बाद पहली बार इस साल संकट प्रभावी होगा

किन देशों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा?

  • रूस कम कीमतों के लिए सबसे अधिक अछूता होने का दावा करता है क्योंकि इसका वार्षिक बजट लगभग $ 40 प्रति बैरल की औसत कीमत पर आधारित है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने इसे और अधिक कुशल बनने के लिए मजबूर कर दिया है।
  • खाड़ी देशों ने सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में $ 2- $ 6 प्रति बैरल की अनुमानित लागत पर तेल का उत्पादन किया, लेकिन उच्च सरकारी खर्च और नागरिकों के लिए उदार सब्सिडी के कारण,अपने बजट को संतुलित करने के लिए उन्हें 70 डॉलर प्रति बैरल या अधिक की कीमत में विक्री की आवश्यकता है
  • तेल पर निर्भर वे राज्य जो संघर्ष, या प्रतिबंधों के वर्षों से पीड़ित हैं, वे सबसे भारी कीमत का भुगतान करेंगे। इराक, ईरान, लीबिया और वेनेजुएला सभी उस श्रेणी में हैं। लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका भी इससे प्रभावित होगा । कुछ राज्यों के लिए शेल ऑयल का उछाल आर्थिक मंदी लेकर आया है और कम कीमतों से तेल कंपनियों को नुकसान होगा।

भारत पर इसका प्रभाव :-

  • जहां तक भारतीय बाजार की बात है तो यह कच्चे तेल को 25 प्रतिशत भारांश देते हुए अपने आयात मानकों का निर्धारण करता है। इसका कच्चा तेल बास्केट इस समय वर्ष 2019-20 के औसत 60.6 डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी 20 डॉलर प्रति बैरल रह गया है।
  • भारतीय कच्चा तेल बास्केट बेंचामार्क 75 प्रतिशत भारांश दुबई-ओमान को देता है। दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती से कच्चे तेल की मांग पहले ही कम हो गई थी, लेकिन कोविड-19 महामारी से हालात और बिगड़ते चले गए।
  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार वर्ष 2020 में तेल की वैश्विक मांग कम होकर 90 लाख बैरल प्रति दिन रह जाएगी।
  • आईईए के अनुसार इससे एक दशक की वृद्धि दर के बराबर नुकसान होगा। आईईए ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘तेल उद्योग के लिए अप्रैल सबसे खराब महीना साबित हो सकता है। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले तेल की मांग 2.9 करोड़ बैरल तक कम हो सकती है।’
  • भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है और तेल कीमतों में कमी से इसे लाभ भी मिल सकता है, लेकिन भारत में उत्पादों की कीमतों उनके अपने मानक सूचकांकों से जुड़ी होती है।
  • इसके अतिरिक्त डॉलर के मुकाबले रुपये के 76.63 तक फिसलने से तेल कीमतों में कमी से होने वाला लाभ सीमित रह सकता है। इस बीच, भारत विशाखापत्तनम, मंगलूर और पाडुर में 53.3 लाख टन तेल का रणनीतिक भंडार जमा करना चाहता है।
  • कच्चा तेल (ब्रेंट) शेष दुनिया या दुनिया की करीब दो-तिहाई मांग के लिए बेंचमार्क है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार कच्चे तेल में भारतीय भागीदारी देसी रिफाइनरियों में प्रसंस्कृत कच्चे तेल के सोर ग्रेड (ओमान और दुबई एवरेज) और स्वीट ग्रेड (ब्रेंट) के 75.50 : 24.50 अनुपात का प्रतिनिधित्व करती है। डब्ल्यूटीआई कीमतों का लंबी अवधि में ब्रेंट कीमतों पर कुछ असर दिख सकता है।
  • तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए बेहतर होगा क्योंकि भारत की ट्विन डेफिसिट में एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतें हैं।

इसका उपभोक्ताओं पर प्रभाव-

  • चीन, भारत और जर्मनी जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा बिल गिरने से कुछ आवश्यक राहत मिल सकती है।
  • उपभोक्ताओं को कम तेल की कीमतों और पंप पर गैस की कीमतों में गिरावट से सामान्य रूप से लाभ होता है, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में जहां खुदरा बाजार सीधे आपूर्ति और मांग के लिए अधिक प्रतिक्रिया करते हैं। कर और अधिभार यूरोप में पंप की कीमतों का एक उच्च हिस्सा बनाते हैं, इसलिए वहां प्रभाव कम चिह्नित है।
  • लेकिन गैस की कीमतों में किसी भी कमी की संभावना वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण कोरोनोवायरस की वजह से अर्थव्यवस्था को अव्यवस्थित होने से होगी।
  • फिर इस मूल्य युद्ध का प्रभाव टेक्सास, लुइसियाना, ओक्लाहोमा, न्यू मैक्सिको और नॉर्थ डकोटा जैसे राज्यों में अमेरिकी तेल उत्पादकों और ऊर्जा क्षेत्र के रोजगार पर पड़ेगा, जिन्होंने पिछले एक दशक में उछाल का आनंद लिया है।

कीमतों को रोकने के उपाय-

  • तेल की कीमतें थामने के लिए तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और रूस ने मई और जून में उत्पादन में 97 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती करने की घोषणा की थी।
  • कीमतों में गिरावट रोकने के लिए जुलाई और दिसंबर में इसे कम कर 77 लाख बैरल प्रति दिन और अप्रैल 2022 तक 58 लाख बैरल प्रति दिन तक करने की योजना तैयार की गई थी। माना जा रहा है कि 2020 के अंत तक इससे बाजार में कुछ हद तक तेल का भंडार कम हो सकता है।
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CURRENT AFFAIRS SCIENCE AND TECHNOLOGY

Telemedicine: A New Horizon in Public Health / टेलीमेडिसिन: सार्वजनिक स्वास्थ्य में एक नया क्षितिज-

वर्तमान में ‘टेलीमेडिसिन’ जिसे ई-स्वास्थ्य सुविधा का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है, कि आवश्यकता को महसूस किया जा रहा है। इस समय संपूर्ण देश की स्वास्थ्य अवसंरचना COVID-19 महामारी के प्रसार को रोकने में लगी हैं। ऐसे में अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों के समक्ष चिकित्सीय सुविधाओं को प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। भारत में टेलीमेडिसिन और टेलीहेल्थ के वर्तमान परिदृश्य का मूल्यांकन करने का यह सही समय है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अध्ययन में यह पाया गया कि टेलीमेडिसिन भारत की संपूर्ण जनसंख्या के लिये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि कर सकता है, इससे मुख्यतः ग्रामीण आबादी अत्यधिक लाभान्वित होगी।

टाइम पत्रिका ने टेलीमेडिसिन को ‘हीलिंग बाई वायर’ (healing by wire) के नाम से संबोधित किया है। हालाँकि प्रारंभ में इसे ‘भविष्यवादी’ और ‘प्रायोगिक’ माना जाता था, लेकिन टेलीमेडिसिन आज एक वास्तविकता है। निश्चित ही भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के कार्मिक कंप्यूटर के कुशल जानकार नहीं हैं, वस्तुतः चिकित्सा में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के संबंध में जागरूकता और जोखिम की कमी है। ये भारत में टेलीमेडिसिन के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। निस्संदेह, हमें तकनीकी जागरूकता की कमी को रुकावट नहीं बनने देना चाहिये और नवाचारों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये।

क्या है टेलीमेडिसिन?-

  • टेलीमेडिसिन स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की एक उभरती हुई विधा है जहाँ सूचना प्रौद्योगिकी के साथ चिकित्‍सा विज्ञान के सहक्रियात्‍मक संकेन्‍द्रण से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्‍वास्‍थ्‍य के विभिन्न क्षेत्र जैसे- शिक्षा, प्रशिक्षण और प्रबंधन के अनेक अनुप्रयोगों के अलावा स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल प्रदायगी की चुनौतियों को पूरा करने की अपार संभाव्‍यता निहित है।
  • यह उतना ही प्रभावी है जितना एक टेलीफोन के ज़रिये चिकित्‍सा संबंधी किसी समस्‍या पर रोगी और स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ आपस में बात करते हैं।
  • ईसीजी, रेडियोलॉजिकल इमेज आदि जैसे नैदानिक परीक्षणों, चिकित्सीय जानकारी के लिये  इलेक्‍ट्रॉनिक चिकित्‍सा रिकॉर्ड भेजने और आईटी आधारित हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की सहायता से रियल टाइम आधार पर अंत:क्रियात्‍मक चिकित्‍सा वीडियो कॉन्‍फ्रेंस करना, उपग्रह और स्‍थलीय नेटवर्क द्वारा ब्रॉडबैंड के उपयोग से वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग जैसे जटिल कार्य करना भी इसका भाग है। 

टेलीमेडिसिन का इतिहास-

  • पिछले कुछ  वर्षों में टेलीमेडिसिन के द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में दी गई सेवाएँ दूरसंचार प्रौद्योगिकी के अपेक्षाकृत नए उपयोग के रूप में दिखाई देती हैं, सच्चाई यह है कि टेलीमेडिसिन विगत 30  वर्षों से किसी न किसी रूप में उपयोग में है। नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration-NASA) ने टेलीमेडिसिन के शुरुआती विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • टेलीमेडिसिन में NASA के प्रयास 1960 के दशक की शुरुआत में प्रारंभ हुए जब मानव ने अंतरिक्ष में उड़ान भरना शुरू किया। मिशन के दौरान फिजियोलॉजिकल पैरामीटर को अंतरिक्ष यान से प्रेषित किया गया था।  
  • टेलीमेडिसिन का सबसे शुरुआती प्रयोग एरिज़ोना प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों को आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रदान करने के लिये किया गया।
  • वर्ष 1971 में नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के द्वारा अलास्का के 26 स्थलों को चुना गया ताकि यह देखा जा सके ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने की दिशा में तकनीकी द्वारा टेलीमेडिसिन का प्रयोग कितना कारगर है।  
  • वर्ष 1989 में नासा ने पहला अंतर्राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन कार्यक्रम प्रारंभ किया जिसके तत्त्वावधान में आर्मेनिया के येरेवन शहर में एक टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किया गया। इसके बाद अमेरिका में चार स्थलों पर टेलीमेडिसिन चिकित्सा केंद्र स्थापित किये गए, जो कंप्यूटर, इंटरनेट इत्यादि तकनीकी सुविधाओं से लैस थे।

भारत में टेलीमेडिसिन का विकास –

  • भारत में इसरो ने वर्ष 2001 में टेलीमेडिसिन सुविधा पायलट प्रोजेक्ट के साथ प्रारंभ की, जिसने चेन्नई के अपोलो अस्पताल को चित्तूर जिले के अरगोंडा गाँव के अपोलो ग्रामीण अस्पताल से जोड़ा था।
  • इसरो द्वारा की गई पहल में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, विदेश मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ राज्य सरकारों ने भी भारत में टेलीमेडिसिन सेवाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मानकीकृत टेलीमेडिसिन चिकित्सा दिशानिर्देश जारी किये गए और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2005 में एक राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन टास्क फोर्स की स्थापना जैसे सकारात्मक कार्य किये गए।
  • इसरो का टेलीमेडिसिन नेटवर्क एक लंबा सफर तय कर चुका है। इस नेटवर्क में 45 दूरस्थ ग्रामीण अस्पतालों और 15 सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों को जोड़ने का कार्य किया का चुका है। दूरस्थ क्षेत्रों में अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप के विभिन्न द्वीप, जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र, उड़ीसा के मेडिकल कॉलेज और अन्य राज्यों के कुछ ग्रामीण / जिला अस्पताल इस नेटवर्क में शामिल हैं।

टेलीमेडिसिन के क्षेत्र –

  • टेलीहेल्थ- टेलीहेल्थ लंबी दूरी की क्लिनिकल हेल्थकेयर, रोगी और पेशेवर स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षा और प्रशिक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य प्रशासन का समर्थन करने के लिये इलेक्ट्रॉनिक सूचना और दूरसंचार प्रौद्योगिकियों का एक समूह है।
  • टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र– टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र वह स्थल है जहाँ रोगी उपस्थित होता है। एक टेलीमेडिसिन परामर्श केंद्र में, रोगी की चिकित्सा जानकारी को स्कैन / परिवर्तित करने, बदलने और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के साथ साझा करने के लिये उपकरण उपलब्ध होते हैं।
  • टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर- टेलीमेडिसिन स्पेशलिटी सेंटर एक स्थल है, जहाँ स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद रहते हैं। वह दूरस्थ स्थल में मौजूद रोगी के साथ बातचीत कर सकता है और उसकी रिपोर्ट देख सकता है तथा उसकी प्रगति की निगरानी कर सकता है।
  • टेलीमेडिसिन प्रणाली- टेलीमेडिसिन प्रणाली हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और संचार चैनल के बीच एक इंटरफेस है जो अंततः सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और दो स्थानों के बीच टेलीकाउंसलिंग को सफल बनाने के लिये दो भौगोलिक स्थानों को जोड़ने का कार्य करता है। हार्डवेयर में एक कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर, वीडियो-कांफ्रेंसिंग उपकरण आदि होते हैं। वहीँ सॉफ्टवेयर रोगी की जानकारी (चित्र, रिपोर्ट, फिल्म) आदि को सक्षम बनाता है। संचार चैनल कनेक्टिविटी को सक्षम करता है जिससे दो स्थान एक दूसरे से जुड़ सकते हैं।

टेलीमेडिसिन की उपयोगिता-

  • सुदूर क्षेत्रों तक आसान पहुँच। 
  • परिधीय स्वास्थ्य सेट-अप में टेलीमेडिसिन का उपयोग रोगी परिवहन में लगने वाले समय और लागत को काफी कम कर सकता है।
  • गंभीर देखभाल की निगरानी, जहाँ रोगी को स्थानांतरित करना संभव नहीं है।
  • चिकित्सा शिक्षा और नैदानिक ​​अनुसंधान जारी रखने में सहायता।
  • आपदा के दौरान चिकित्सीय सुविधाओं में किसी प्रकार की रुकावट नहीं।
  • टेलीमेडिसिन प्रौद्योगिकी के उपयोग से सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि दूरसंचार स्थापित होने के बाद यह चिकित्सा पद्धतियों में विशेषज्ञता ला सकता है।
  • रोबोट्स का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य टेलीमेटेड सर्जरी
  • यह महामारी की आशंका में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह स्थानीय और वैश्विक स्तर पर बीमारियों की रियल टाइम निगरानी में एक सक्षम विकल्प है। 

इस क्षेत्र में सरकार के प्रयास

  • संजीवनी- वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने टेलीमेडिसिन से संबंधित एक सॉफ्टवेयर जारी किया जिसे संजीवनी नाम दिया गया। इसे टेलीमेडिसिन के हाइब्रिड मॉडल के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जो ‘स्टोर और फॉरवर्ड’ के साथ-साथ रियल टाइम की अवधारणा का उपयोग करता है।
  • सेहत- वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन के ज़रिये विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अस्पतालों का नेटवर्क संचालित करने वाली कंपनी अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर 60 हजार कॉमन सर्विस सेंटरों (सीएससी-Common Service Centre) में टेलीमेडिसिन सेवा ‘सेहत’ शुरू की है।
  • कॉनटेक- कॉनटेक’ परियोजना दरअसल ‘कोविड-19 नेशनल टेलीकंसल्टेशन सेंटर’ का संक्षिप्त नाम है। यह एक टेलीमेडिसिन केन्द्र है जिसकी स्थापना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान., नई दिल्ली के द्वारा की गई है, जिसमें देश भर से विशेषज्ञों के बहु-आयामी सवालों का उत्तर देने के लिये विभिन्न नैदानिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध होंगे। यह एक बहु-मॉडल दूरसंचार केन्द्र है जिसके माध्यम से देश के अलावा विश्व के किसी भी हिस्से से दोनों ओर से ऑडियो-वीडियो वार्तालाप के साथ-साथ लिखित संपर्क भी किया जा सकता है।

इसके समक्ष चुनौतियाँ –

  • डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी ई-चिकित्सा या टेलीमेडिसिन के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त और परिचित नहीं हैं।
  • टेलीमेडिसिन के परिणामों के बारे में रोगियों में विश्वास की कमी है।
  • भारत में तकनीक और संचार लागत बहुत अधिक है, कभी-कभी यह टेलीमेडिसिन को वित्तीय रूप से अक्षम बना देती है।
  • भारत में, लगभग 40% जनसंख्या गरीबी के स्तर से नीचे रहती है। ऐसे में इस वर्ग का तकनीकी रूप से दक्ष होना अत्यधिक कठिन है।
  • विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर द्वारा समर्थित ई-चिकित्सा को अभी भी परिपक्व होने की आवश्यकता है। सही निदान और डेटा के अन्वेषण के लिये, हमें उन्नत जैविक सेंसर और अधिक बैंडविड्थ समर्थन की आवश्यकता है।
  • टेलीमेडिसिन स्वास्थ्य सेवा के मामले में दिशानिर्देश बनाने व इन दिशानिर्देशों का उचित अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिये शासी निकाय का अभाव है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम -रासुका/ National Security Act-NSA:-

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लगाए लॉकडाउन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाओं के देख अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सख्त फैसला ले रही है। राज्य सरकार की ओर से आदेश जारी किया गया है अब जो लोग भी पुलिसकर्मियों पर हमला करेंगे उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका (NSA) लगा दिया जाएगा।देश में कई जगहों पर पुलिस और स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले की खबरें आई हैं. बिहार के मुंगेर जिला के कासिमबाजार थाना क्षेत्र के हजरतगंज इलाके में कोरोना वायरस संक्रमण के संदिग्ध व्यक्ति की जांच के लिए नमूना लेने गयी डॉक्टरों और पुलिस की टीम पर स्थानीय लोगों ने पथराव किया।

इसके अलावा हाल ही में मुरादाबाद, राजस्थान के टोंक आदि में भी ऐसी घटनाएँ हुई है जँहा स्वास्थ्य कर्मी एवं सुरक्षा कर्मियों पर हमले हो रहे है । इसी संदर्भ में माँग की जा रही है कि यंहा भी U.P. की तरह NSA लागू किया जाए।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA):-

  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) का उपयोग केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा निवारक निरोध उपायों के रूप में किया जाता है।
  • NSA किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा उत्पन्न करने से रोकने हेतु केंद्र या राज्य सरकार को व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार देता है।
  • सरकार किसी व्यक्ति को आवश्यक आपूर्ति एवं सेवाओं के रखरखाव तथा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने से रोकने के लिये NSA के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती है।
  • किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने हिरासत में रखा जा सकता है। लेकिन सरकार को मामले से संबंधित नवीन सबूत मिलने पर इस समय सीमा को बढ़ाया जा सकता है।

NSA की पृष्टभूमि:-

  • भारत में निवारक निरोध कानून की शुरुआत औपनिवेशिक युग के बंगाल विनियमन- III, 1818 (Bengal Regulation- III, 1818 से मानी जाती है। इस कानून के माध्यम से सरकार, किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रियाओं से गुज़रे बिना सीधे ही गिरफ्तार कर सकती थी।
  • एक सदी बाद ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट, 1919 (Rowlatt Acts-1919) को लागू किया, जिसके तहत बिना किसी परीक्षण (Trial) के संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करने की अनुमति दी गई।
  • स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950 में निवारक निरोधक अधिनियम (Preventive Detention Act- PDA) बनाया गया, जो 31 दिसंबर, 1969 तक लागू रहा।
  • वर्ष 1971 में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act- MISA) लाया गया जिसे वर्ष 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया। बाद में कॉंग्रेस सरकार द्वारा पुन: NSA लाया गया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा कानून ,राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से जुड़ा एक कानून है।वर्तमान में यही क़ानून प्रभावी है।

NSA के साथ विवाद:-

  • मूल अधिकारों से टकराव:
    • सामान्यत: जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे कुछ मूल अधिकारों की गारंटी दी जाती है। इनमें गिरफ्तारी के कारण को जानने का अधिकार शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 22 (1) में कहा गया है कि एक गिरफ्तार व्यक्ति को परामर्श देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। हालाँकि निवारक निरोध के तहत गिरफ़्तारी हो सकती है।
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता से टकराव:
    • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code- Cr.PC) की धारा 50 के अनुसार गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार तथा जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिये। इसके अलावा Cr.PC की धारा 56 तथा 76 के अनुसार गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर एक व्यक्ति को अदालत में पेश किया जाना चाहिये। इनमें से कोई भी अधिकार NSA के तहत हिरासत में लिये गए व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है।
  • आँकड़ों की अनुपलब्धता:
    • National Crime Records Bureau- NCRB जो देश में अपराध संबंधी आँकड़े एकत्रित तथा उनका विश्लेषण करता है, NSA के तहत आने वाले मामलों को अपने आँकड़ों में शामिल नहीं करता है क्योंकि इन मामलों में कोई FIR दर्ज नहीं की जाती है। अत: NSA के तहत किये गए निवारक निरोधों की सटीक संख्या के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

स्रोत: THE HINDU

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IMD का मानसून अनुमान/IMD-Monsoon Forecast-

चर्चा में क्यों?-

• एक और जहां कोरोना के कारण भारत की अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब हो रही है वहीं दूसरी और IMD के इस अनुमान ने कुछ राहत प्रदान की है।

  • भारत मौसम विज्ञान विभाग( India Meteorological Department- IMD) के अनुसार, वर्ष 2020 में सामान्य मानसून रहने की संभावना है।
  • IMD के अनुसार वर्ष 2020 में सामान्य मानसून (अगस्त तथा सितंबर में सामान्य से अधिक) रहने की संभावना है।
  • IMD दो-चरणीय मानसून पूर्वानुमान जारी करता है:
    • पहला पूर्वानुमान अप्रैल माह में जबकि दूसरा मई माह के अंतिम सप्ताह में जारी किया जाता है। मई माह में विस्तृत मानसून पूर्वानुमान जारी किया जाता है।

सामान्य वर्षा की परिभाषा में बदलाव:-

  • ‘लंबी अवधि के औसत’ (Long Period Average- LPA) वर्षा का उपयोग, मानसून की ‘सामान्य वर्षा’ की गणना करने में किया जाता है। LPA वर्ष 1961-2010 की अवधि के दौरान हुई वर्षा का औसत मान है। LPA के आधार पर पूरे देश में मानसून की सामान्य वर्षा 88 सेमी है।
  • ‘सामान्य वर्षा’ (Normal Rainfall) की परिभाषा को फिर से परिभाषित किया गया है। इसे 89 सेमी. से घटाकर 88 सेमी. कर दिया गया है। मानसून मौसमी में वर्षा के सामान्य से ± 5% विचलन के साथ के ‘सामान्य वर्षा’ होने की संभावना है।

सामान्य मानसून के आधार: –

  • मानसून पूर्वानुमान के मॉडल:
    • मानसून पूर्वानुमान के Dynamical Mode जो सुपर कंप्यूटर पर आधारित है, के अनुसार, इस बार मानसून के समय सामान्य से अधिक वर्षा होने की उच्च संभावना (70%) है।
    • Statistical Models के अनुसार, इस बार सामान्य मानसून की 41% संभावना है जबकि इस मॉडल पर पूर्ववर्ती वर्षों में 33% संभावना रहती थी।
  • अल-नीनो (El-Nino):
    • भारत में अल-नीनोके कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है जबकि, ला-नीनो के कारण अत्यधिक वर्षा होती है।
    • IMD के अनुसार इस बार अल-नीनो का भारतीय मानसून पर नगण्य प्रभाव रहेगा।
  • हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole- IOD):
    • IOD भी भारतीय मानसून को प्रभावित करता है। सकारात्मक IOD के दौरान मानसून की वर्षा पर सकारात्मक और नकारात्मक IOD के दौरान मानसून की वर्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • पूर्वानुमान के अनुसार, Indian Ocean Dipoleके ‘तटस्थ’ रहने की उम्मीद है।

सामान्य मानसून का महत्त्व:-

  • खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि:
    • वर्षा अच्छी होने का सबसे अच्छा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। जहाँ सिंचाई की सुविधा मौजूद नहीं है, वहाँ वर्षा होने से अच्छी फसल होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • विद्युत संकट में कमी:
    • यदि वर्षा कम हो और जलस्तर कम हो जाए तो बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है।यदि अच्छी वर्षा होगी तो जलाशयों में पर्याप्त पानी आएगा जिससे विद्युत उत्पादन में सुधार होगा।
  • जल संकट का समाधान:
    • अच्छे मानसून से पीने के पानी की उपलब्धता संबंधी समस्या का भी काफी हद तक समाधान होता है। दूसरे, भूजल का भी पुनर्भरण होता है।
  • वर्षा के पूर्वानुमान से, सरकार तथा किसानों को बेहतर रणनीति बनाने में सहायता मिलती है। सरकार इसके माध्यम से सूखा या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिये सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए बेहतर तैयारियाँ कर सकती है।
  • साथ ही यदि मानसून अच्छा रहा तो से कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था को हुए नुक़सान की भरपाई में भी मदद मिल पाएगी।

स्रोत: The Hindu

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कोरोना को नियंत्रित करने के आगरा, भीलवाड़ा व पथानमथिट्टा मॉडल-

चर्चा में क्यों?—

आगरा, भीलवाड़ा और पथानमथिट्टा जिलों में शुरुआती मामलों के बाद, संबंधित राज्य और जिला प्रशासन ने उन भौगोलिक क्षेत्रों में प्रकोप को रोकने के लिए कड़ी मेहनत की और बहुत हद तक सफलता प्राप्त की इसलिए इन ज़िलो की कार्यप्रणाली को कोरोना को रोकने के रूप में देखा जा रहा है।

आगरा मॉडल:उत्तर प्रदेश

  • “आगरा मॉडल” मार्च के शुरू में आरम्भ हुआ । दो व्यक्ति जिन्होंने एक रिश्तेदार के साथ ऑस्ट्रिया की यात्रा की थी – बाद में दिल्ली का पहला COVID-19 मामला आगरा के लिए घर चला गया जहाँ,  कुछ दिनों के बाद, छह सकारात्मक मामले पाए गए। जिला प्रशासन और एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम कर्मियों द्वारा किए गए संपर्कों के लिए स्थानीयकृत अभी तक व्यापक रूप से तलाशी अभियान चलाया गया था।
  • आगरा के लोहामंडी में 3 किलोमीटर के दायरे में एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र,जिसे 2 बजे सकारात्मक रिपोर्ट आने के तुरंत बाद बंद कर दिया गया, और 1,248 टीमों ने 1,65,000 से अधिक घरों में सघन संपर्क किया।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा: “राज्य, जिला प्रशासन और सीमावर्ती कर्मचारियों ने अपने मौजूदा स्मार्ट सिटी को कमांड और कंट्रोल सेंटर (ICCC) के साथ वार रूम के रूप में उपयोग करके अपने प्रयासों का समन्वय किया।
  • क्लस्टर रोकथाम और प्रकोप रोकथाम योजनाओं के तहत, जिला प्रशासन ने महामारी  की पहचान की, नक्शे पर सकारात्मक पुष्टि वाले मामलों के प्रभाव को कम किया और जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई सूक्ष्म योजना के अनुसार एक विशेष कार्य बल तैनात किया।
  • हॉटस्पॉट्स को एक सक्रिय सर्वेक्षण और रोकथाम योजना के माध्यम से प्रबंधित किया गया था। क्षेत्र की पहचान उपकेंद्र से 3 किलोमीटर के दायरे में की गई थी, जबकि 5 किलोमीटर बफर जोन की पहचान क्षेत्र के रूप में की गई थी।
  • नियंत्रण क्षेत्र में, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को रोपित किया गया था। 1,248 टीमों में से प्रत्येक में 2 कर्मचारी थे जिनमें ANMs / ASHA / AWW शामिल थे, जो घरेलू स्क्रीनिंग के माध्यम से 9.3 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई । इसके अतिरिक्त, पहले संपर्क ट्रेसिंग का प्रभावी और प्रारंभिक ट्रैकिंग पूरी तरह से मैप किया गया था।
  • आगरा मॉडल महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उच्च  घनत्व के क्षेत्रों में प्रभावी साबित हुआ है, जिन्हें “हॉटस्पॉट” कहा जा रहा है। आधिकारिक बयान में आगरा सामुदायिक प्रसारण का सबसे पहला उदाहरण  था।
  • सामुदायिक संचरण तब होता है जब ऐसे मामलों का पता लगना शुरू हो जाता है, जहां किसी प्रभावित देश में यात्रा के इतिहास के स्पष्ट संकेत  मिलते हैं, या एक पुष्टि किए गए सकारात्मक मामले के साथ संपर्क होता है। एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया जैसे विशेषज्ञ अब हॉटस्पॉट्स में “स्थानीयकृत सामुदायिक प्रसारण” के बारे में बात कर रहे हैं।

भीलवाड़ा मॉडल-राजस्थान

DM-भीलवाड़ा
  • राजस्थान का भीलवाड़ा COVID-19 का प्रारंभिक केंद्र था। यहाँ के प्रशासन ने ” नियंत्रण रणनीति” का प्रयोग किया , जिसे “भीलवाड़ा मॉडल” भी कहा जा रहा है।
  • जिला कलेक्टर कार्यालय द्वारा 26 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, 19 मार्च को भीलवाड़ा में पहला कोरोना मामला, एक निजी अस्पताल में एक डॉक्टर था। 26 मार्च तक, अस्पताल में सकारात्मक मामलों की संख्या 17 थी, उनमें से सभी अस्पताल के कर्मचारी और रोगी थे।
  • प्रकोप राजस्थान सरकार के लिए एक बड़े संकट के रूप में उभरा, क्योंकि डॉक्टरों ने सकारात्मक परीक्षण करने से पहले, नर्सिंग स्टाफ और रोगियों सहित कई लोगों के साथ संवाद किया था।
  • धारा 144 सीआरपीसी लागू होने के साथ शहर पूरी तरह से आइसोलेट हो गया था। पहले चरण में, आवश्यक सेवाओं की अनुमति दी गई थी; दूसरे चरण में, शहर और जिले की सीमाओं को बंद कर दिया गया और हर प्रवेश और निकास बिंदु पर चेकपोस्ट स्थापित किए गए।
  • सभी ट्रेनों, बसों और कारों को रोक दिया गया। पड़ोसी जिलों के जिलाधिकारियों को भी अपनी सीमाओं को सील करने के लिए कहा गया था। नियंत्रण क्षेत्र आम तौर पर उपरिकेंद्र के आसपास 3 किमी है, और बफर क्षेत्र 7 किमी स्थापित किया गया।
  • कंटेंट और बफर जोन को Move नो-मूवमेंट ’जोन में बदल दिया गया और COVID-19 मामलों के लिए क्लस्टर मैपिंग की गई।
  • इसके माध्यम से, छह क्षेत्रों की पहचान की गई और संदिग्ध मामलों की निरंतर जांच के लिए विशेष टीमों को तैनात किया गया। नियंत्रण और बफर ज़ोन, सभी एम्बुलेंस और पुलिस वाहन, स्क्रीनिंग सेंटर और संगरोध केंद्र, कलेक्ट्रेट, पुलिस लाइन और अन्य सार्वजनिक-व्यवहार कार्यालयों को दैनिक आधार पर कीटाणुरहित किया गया।
  • अंतिम गणना में, भीलवाड़ा में 3,072 टीमों ने 2,14,647 घरों का सर्वेक्षण किया था, जिसमें 10,71,315 लोग शामिल थे और इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों के 4,258 मामले पाए गए जिन्हें COVID-19 के लिए परीक्षण किया जाना था।
  • चार निजी अस्पतालों को 25 अलग-अलग बेड के साथ अधिग्रहित किया गया था। 1,541 कमरों के साथ 27 होटलों में केंद्र स्थापित किए गए थे, जिसमें अंततः 950 लोगों को कवारन्टाइन रखा गया था, जबकि 7,620 लोगों को घर कवारन्टाइन में रखा गया था।
  • आवश्यक किराने, फल, सब्जियों और दूध की डोर-टू-डोर आपूर्ति थी। कच्चे और पके हुए खाने के पैकेट जरूरतमंदों को बांटे गए और उद्योगों, कारखानों और ईंट-भट्टों के मजदूरों हेतु पूर्ण व्यवस्था थी ।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भीलवाड़ा में लगभग 28 मामले हैं।

पठानमथिट्टा मॉडल-केरल

  • केरल में पथानामथिट्टा मॉडल की पहचान रही है। इस जिले में मार्च के प्रारम्भ में अपने पहले मामलों को देखा, जब इटली के एक तीन-सदस्यीय परिवार ने कई रिश्तेदारों को संक्रमित किया ।
  • सीमा सील और संपर्क अनुरेखण भी यहाँ हुआ। लेकिन केवल स्क्रीनिंग संपर्कों से अधिक, जिले में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जांच की गई और एक डेटाबेस बनाया गया ताकि वे आसानी से कम सूचना पर पहुंच सकें।
  • इसके अतिरिक्त , कोरोना सकारात्मक मामलों के यात्रा मार्ग को दिखाते हुए ग्राफिक्स बनाए गए और प्रचारित किया गया। इसमें उन सभी स्थानों का विवरण शामिल था जिसमे परिवार ने यात्रा की थी, और उन्होंने 29 फरवरी से 6 मार्च के बीच संभावित संपर्क बनाए थे।
  • जब लोगों को मार्ग के नक्शे से पता चला कि वे वास्तव में एक सीओवीआईडी -19 पॉजिटिव व्यक्ति के संपर्क में आए हैं, तो कई लोग स्क्रीनिंग या इलाज के लिए चले गए।
  • कवारन्टाइन के तहत प्रतिदिन पूरी तरह से जांच की जाती थी, यहां तक कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की 14 टीमों ने 4,000 लोगों की निगरानी की, जिन्होंने इसकी सीलिंग से पहले जिले में प्रवेश किया था।
  • आईएचआरडी कॉलेज, चेंगन्नूर के इंजीनियरिंग छात्रों द्वारा डिज़ाइन किया एक ऐप – कोरोना आरएम भी प्रयुक्त किया गया। होम कवारन्टाइन के अंतर्गत आने वालों पर इस ऐप के जरिए नजर रखी गई जिससे उनके ठिकाने पर नजर रखी जा सकती है और अगर उन्होंने कवारन्टाइन को तोड़ा तो जीपीएस के प्रयोग से इसका तुरंत पता लगाया जा सकता है।
  • इन सबके प्रभाव से केरल में पिछले दिनों में नए मामलों की वृद्धि धीमी हो गई है।
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देखो अपना देश: पर्यटन मंत्रालय का कार्यक्रम/Dekho Apna Desh

मानव जीवन पर कोविड-19 का प्रभाव सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बहुत ज्यादा पड़ा है। इसके कारण पर्यटन, एक क्षेत्र के रूप में, स्वाभाविक रूप से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि घरेलू स्तर पर या सीमा पार से कोई आवागमन नहीं हो पा रहा है। लेकिन प्रौद्योगिकी के कारण, स्थानों और गंतव्यों तक आभासी रूप से पहुंचना और बाद के दिनों के लिए अपनी यात्रा की योजना बनाना संभव है। इन अभूतपूर्व समय में, मानव संपर्क को बनाए रखने के लिए प्रौद्योगिकी काम आ रही है और यह भी विश्वास है कि फिर से यात्रा करने के लिए जल्द ही समय अच्छा हो जाएगा।

इसको ध्यान में रखते हुए, पर्यटन मंत्रालय ने आज से अपनी ‘देखोअपनादेश” नामक वेबिनार श्रृंखला की शुरूआत की है जिससे हमारे अतुल्य भारत की संस्कृति और विरासत की गहरी और विस्तृत जानकारी प्रदान की जा सके। पहली वेबिनार, जो एक श्रृंखला का हिस्सा थी और प्रकाशित हुई, इसने दिल्ली के लंबे इतिहास को छूआ और यह 8 शहरों के रूप में सामने आया। प्रत्येक का चरित्र अपने आप में अद्वितीय था और जिसने अपने पीछे अवशेषों को छोड़ा, जिसके कारण दिल्ली एक शानदार शहर बना, जो कि वह आज है। इस वेबिनार का शीर्षक “सिटी ऑफ सिटीज- दिल्लीज पर्सनल डायरी” था।

केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), ने कहा कि वेबिनारों की श्रृंखला एक निरंतर विशिष्टता वाली होगी और मंत्रालय अपने स्मारकों, पाक शैलियों, कलाओं, नृत्य के रूपों सहित भारत के विविध और उल्लेखनीय इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करने की दिशा में काम करेगा, जिसमें प्राकृतिक परिदृश्य, त्योहार और समृद्ध भारतीय सभ्यता के कई अन्य पहलू भी शामिल हैं।

इस सत्र का मूल पर्यटन जागरूकता और सामाजिक इतिहास पर आधारित है। दिलचस्प उपाख्यानों से सजी हुई इस सत्र का आयोजन, पर्यटन मंत्रालय के लिए इंडिया सिटी वॉक द्वारा किया गया, जिसमें 5,546 पंजीकृत व्यक्तियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही और इसमें कई रोचक प्रश्न भी पूछे गए जो प्रतिभागियों की दिलचस्पी को दर्शाते हैं। इस वेबिनार को जल्द ही सार्वजनिक डोमेन के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। यह इंस्टाग्राम और फेसबुक के माध्यम से मंत्रालय के सोशल मीडिया हैंडल- अतुल्य भारत पर उपलब्ध होगा।

देखोअपनादेश” वेबिनार श्रृंखला जारी रहेगी और भारत की विविधता, उल्लेखनीय इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करने की दिशा में मंत्रालय काम करता रहेगा: प्रह्लाद सिंह पटेल( संस्कृति मंत्री)

स्रोत-PIB

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Member of Parliament Local Area Development Scheme postponed/संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना स्थगित

चर्चा में क्यों/ Why in news?-

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोरोनावाइरस की चुनौती से निपटने हेतु फंड जुटाने के लिये अगले दो वर्षों तक ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (Members of Parliament Local Area Development Scheme- MPLADS) को स्थगित करने और अगले एक वर्ष के लिये सभी संसद सदस्यों के वेतन में 30% की कटौती करने का निर्णय लिया है।

संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ 

(Members of Parliament Local Area Development Scheme- MPLADS):

  • MPLADS की शुरुआत 23 दिसंबर, 1993 को हुई थी।
  • MPLADS पूर्ण रूप से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना है, इस योजना के तहत एक संसदीय क्षेत्र के लिये वार्षिक रूप से दी जाने वाली राशि की अधिकतम सीमा 5 करोड़ रुपए हैं।
  • इस योजना के माध्यम से संसद सदस्य अपने संसदीय क्षेत्रों में स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर विकास कार्यों को शुरू करने के लिये सुझाव दे सकते हैं।
  • इस योजना की शुरुआत के बाद से ही देश में राष्ट्रीय प्राथमिकता जैसे- पेयजल, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सड़क आदि के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये गए हैं।
  • इसके तहत योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु नीति निर्माण, धनराशि जारी करने और निगरानी तंत्र के निर्धारण का कार्य ‘केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय’ द्वारा किया जाता है।

मुख्य बिंदु:  

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 6 मार्च, 2020 को ‘संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954’ में संशोधन के लिये एक अध्यादेश जारी किया गया था।
  • केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री के अनुसार, इस अध्यादेश के माध्यम से संसद सदस्यों के वेतन से कटौती के पश्चात प्राप्त राशि और MPLADS फंड (लगभग 8000 करोड़ रुपए) को ‘भारत की संचित निधि’ (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाएगा, जिसका उपयोग COVID-19 से निपटने के लिये किया जाएगा।

भारत की संचित निधि/Consolidated Fund of India-

  • संचित निधि सभी सरकारी खातों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। 
  • सरकार को मिलने वाले सभी प्रकार के राजस्व (सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, आयकर, सम्पदा शुल्क आदि) और सरकार द्वारा किये गए खर्च (कुछ विशेष खर्च को छोड़कर) संचित निधि का हिस्सा हैं।  
  • संचित निधि की स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 के तहत की गई थी। 
  • संसद के अनुमोदन के बिना इस निधि से कोई धनराशि नहीं निकाली जा सकती है।
  • कुछ विशेष खर्च (जिनके लिये आकस्मिक निधि या सार्वजनिक निधि का प्रयोग किया जाता है) को छोड़कर सरकार के सभी खर्चों का वहन संचित निधि से ही किया जाता है।
  • केंद्र की ही तरह सभी राज्यों की अपनी संचित निधि होती है। 
  • इस अध्यादेश के अनुसार, अगले एक वर्ष (वित्तीय वर्ष 2020-21) के लिये सभी संसद सदस्यों (प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों सहित) के वेतन से 30 प्रतिशत की कटौती की जाएगी। साथ ही संसद सदस्यों को अपने संसदीय क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिये में प्राप्त होने वाले MPLADS को भी अगले दो वर्षों (वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22) के लिये स्थगित कर दिया गया है।
  • MPLADS के स्थगन और सांसदों के वेतन में कटौती के संदर्भ में यह परिवर्तन 1 अप्रैल, 2020 को शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष से लागू होंगे।
  • सरकार के इस प्रयास में सहयोग देने के लिये राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों ने अपने वेतन में 30% की कटौती करने का निर्णय लिया है।
  • हालाँकि सरकार ने यह स्पष्ट किया कि इसके तहत केवल संसद सदस्यों के वेतन से कटौती की जाएगी, सदस्यों के अन्य भत्तों और पूर्व सांसदों की पेंशन से कोई कटौती नहीं की जाएगी।
  • ध्यातव्य है कि हाल ही में केंद्र सरकार के कर्मचारियों ने COVID-19 से निपटने में अपने सहयोग के रूप में स्वेच्छा से अपने एक दिन के वेतन सरकार को देने का फैसला किया था।
  • केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री के अनुसार, सरकार द्वारा MPLADS को स्थगित किये जाने से पहले ही कई संसद सदस्यों ने अपने फंड से COVID-19 के लिये सहयोग किया था।
  • राज्यसभा सचिवालय द्वारा पिछले सप्ताह दी गई जानकारी के अनुसार, राज्यसभा के 74 सदस्यों ने कुल 100 करोड़ रुपए और 265 लोकसभा सदस्यों ने 265 करोड़ रुपए का योगदान दिया था।
  • संसद सदस्यों के वेतन में वृद्धि के संदर्भ में वर्ष 2018 की घोषणा के अनुसार, वर्तमान में संसद सदस्यों को प्रति माह वेतन के रूप में 1 लाख रुपए, 70 हजार रुपए (निर्वाचन क्षेत्र भत्ता), 60 हजार रुपए (कार्यालय चलने के लिये) के साथ कुछ अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।