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ART AND CULTURE

सैन्धव सभ्यता कालीन मूर्तिकला/Indus Valley Civilisation-Sculpture

सिन्धु घाटी सभ्यता एक विकसित सभ्यता थी। स्वाभाविक है कि उस समाज में कला और शिल्प भी उन्नत अवस्था में होगी। इस काल में देवी-देवताओं की, नारी की, नर्तकी की, बौनों की, पशु तथा पक्षियों की मूर्तियों का निर्माण हुआ। सिंधु सभ्यता की इन मूर्तियों में आश्यर्चजनक परिपक्वता देखने को मिलती है। ये मूर्तियाँ पाषाण, धातुओं और मिट्टी से निर्मित हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इनका निर्माण सेलखड़ी, अलबेस्टर, चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर, स्लेटी पत्थर आदि की सहायता से किया गया है।

सिंधु सभ्यता की मूर्ति कला को सामान्यता निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

१- मिट्टी की मूर्तियाँ/ टेराकोटा

२- प्रस्तर मूर्तियाँ/ पाषाण मूर्तियाँ

३-धातु मूर्तियाँ- धातु की मूर्तियों के निर्माण के लिए सैंधव वासी संभवतः लुप्त मोम अथवा द्रवी मोम पद्धति( Lost Wax Method) का प्रयोग करते थे।

प्रस्तर मूर्तियों में सर्वप्रथम मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी अथवा पुरोहित की मूर्ति का उल्लेख किया जा सकता हैं। इसे योगी की मूर्ति मानने का कारण, इसकी मुद्रा है। मूर्ति की आधी आँख मुंदी हुई है, जिससे वह ध्यानमग्न योगी की तरह प्रतीत होते है।

मस्तक पर गोल अलंकरण है तथा यह बाँये कंधे को ढकते हुए तिपतिया छाप शाल ओढ़े हुए है जो यह दर्शाता है कि उन्हें कढ़ाई का ज्ञान था। इसके नेत्र अधखुले तथा निचला होठ मोटा तथा उसकी दृष्टि नाक के अग्रभाग पर टिकी हुई है। मस्तक छोटा तथा पीछे की ओर ढलुआ है, गर्दन कुछ अधिक मोटी है तथा मुंह की गोलाई बड़ी है। मौके के अनुसार, कलाकार ने इस मूर्ति के माध्यम से किसी विशिष्ट व्यक्ति का यथार्थ रूपांकन किया है।

हड़प्पा की पाषाण मूर्तियों में दो सिर रहित मानव मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पहली मूर्ति किसी पुरूष की है और दूसरी मूर्ति को विद्वानों ने नर्तकी बताया है। इन दोनों ही मूर्तियों के शरीर सौष्ठव को कलाकार ने अत्यंत कुशलता से उभारा है। पहली मूर्ति लाल बलुए पत्थर की तथा दूसरी काले पत्थर की बनी है। दोनों ही मूर्तियों के मस्तक तथा पैर टूटे हुए हैं। पहली मूर्ति किसी सीधे खड़े पुरूष की है। इसकी गर्दन के ऊपर, कन्धों के निचले भागों तथा जंघों के नीचे छेद बने हुए हैं जो किसी बरमें द्वारा उकेरे हुए लगते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि शरीर के विविध अंगों जैसे मस्तक, हाथ, पैर आदि को अलग-अलग बनाकर किसी मशाले द्वारा जोड़ने की प्रथा उस काल में प्रचलित थी। इस नग्न प्रतिमा को कुछ विद्वान कोई जैन मूर्ति मानते हैं। दूसरी मूर्ति जो स्लेटी पत्थर की है, का मुण्ड अलग से बैठाया गया था तथा हाथ-पैर भी एक अधिक भागों में अलग से जोड़े गए थे। मार्शल, मैके, ह्नीलर आदि विद्वानों ने इसे किसी पुरूष की मूर्ति माना है। 

इनका गठन अत्यंत सजीव एवं प्रभावशाली है जिन्हें देखने से ऐतिहासिक युग की दीदारगंज से प्राप्त यक्षिणी जैसी कुछ मूर्तियों का आभास होने लगता है। यही नहीं, यूनानी कलाकारों ने गांधार की बुद्ध मूर्तियों के निर्माण में जो यथार्थता दिखायी है, वह इन मूर्तियों में भी देखी जा सकती है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ों की पाषाण मूर्तियों के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि हड़प्पा के शिल्पकार यथार्थ रूपांकन में अधिक दक्ष थे जबकि मोहनजोदड़ो के शिल्पकार शरीर के विविध अंगों का यथार्थ रूप उकेरने में सफल नहीं हो पाये हैं।

पाषाण के अतिरिक्त सैंधव कलाकारों ने धातुओं से भी सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण किया। इस सभ्यता की कला के बचे नमूनों में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय मोजनजोदड़ो से प्राप्त एक नर्तकी की कांस्य मूर्ति है। यह सुन्दर एवं भावयुक्त है। इसके शरीर पर वस्त्र नहीं है। बाँया हाथ कलाई से लेकर कंधे तक चूडि़यों से भरा है तथा नीचे की ओर लटक रहा है। दायें हाथ में वह कंगन तथा केयूर पहने हुए है और वह कमर पर टिका हुआ है। उसके घुंघराले बाल पीछे की ओर जूड़ा में बंधे हुए हैं, गले में छोटा हार तथा कमर में मेखला है।

नर्तकी के पैर जो थोड़ा आगे बढ़े हुए हैं, संगीत के लय के साथ उठते हुए जान पड़ते हैं। अपनी मुद्रा की सरलता एवं स्वाभाविकता के कारण यह मूर्ति सबकों अचंभित करती है। मार्शल के अनुसार, इस मूर्ति के माध्यम से कलाकार ने किसी आदिवासी स्त्री का यथार्थ रूपांकन करने का प्रयास किया है। 

नर्तकी की मूर्ति यह दर्शाती है कि सैंधव लोगों को न केवल नृत्य-संगीत का ज्ञान था बल्कि उसमें रूचि भी थी। साथ ही यह मूर्ति यह भी दर्शाती है कि वहाँ के लोगों का जीवन स्तर केवल जीविका चलाने के साधन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उससे कहीं उच्च था और लोगा विलाश जीवन सतर का लुत्फ उठाते थे।